निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ अ० १ पा० २ सू० २१ करके निवृत्त होता है। जैसे—'देवदत्तश्चतुर्वेदाभिज्ञः' देवदत्त चतुर्वेदाभिज्ञ है, यह वाक्य देवदत्तको उद्देश्य करके उसमें चतु- र्वेदाभिज्ञता-रूप गुणके सम्बन्धको कहकर फिर कुछ नहीं करता तो यहां स्तुति ही सिद्ध होती है। तथा "यश्चतुर्वेदा- भिज्ञस्तमानय" 'जो चतुर्वेदाभिज्ञ हो, उसको ला' इस वाक्यके यत्नकी समाप्ति आनयन क्रियाके प्रैष पर होती हैं, किन्तु जिसका आनयन इष्ट है, उसकी पहिचान चतुर्वेदाभिज्ञता गुणसे ही होतो है, इस लिये उसको पहिले कहकर 'आनय' क्रियाका प्रयोग किया जाता है, इस लिये यहां उस गुणयुक्त पुरुषका स्मरणमात्र होता है, उससे उस पुरुषकी प्रशंसा नहीं होती, यही स्तुति और अभिधानका भेद है। “प्रउगं शंसति” “आज्यैः स्तुवते” इत्यादि श्रुति वाक्योंमें स्तुत्यर्थक 'शंसति' आदि क्रियाओंसे जिन मन्त्रोंका विनियोग होता है, वे मन्त्र अनुष्ठानस्मरण-रूप दृष्ट प्रयोजनके लिये नही होते, 'इसीसे उनकी प्रधानता रहती है, किन्तु गौणता नहीं, तथा वे अन्य-देवताके स्तावक होकर भी अन्य-देवताके यजनके सन्निधानमें पठनीय होते हैं, क्योकि—उनसे उस कर्मकी पुष्टि होती है। इसीसे जैमिनीय मीमांसा [अ० २ पा० १ अ० ४] में "अपि वा श्रुति-संयोगात् प्रकरणे स्तौति-शंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्याताम्” इस सूत्रसे स्तोत्र तथा शस्त्र मन्त्रोकी प्रधानता सिद्ध की है। अर्थात् स्तौति और शंसति धातुओकी स्मरणार्थता मान ली जावे तो उनके स्तुतिरूप श्रौत अर्थका बाध हो जायगा, इस लिये अदृष्टकी कल्पना करके भी उनका प्राधान्य माना गया है। जैसे कि—इसी द्वितीय पादमें उपमार्थक 'इव'का उदाहरण “अग्निरिवमन्यो !” [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] यह मन्त्र है 'इस मन्त्रका मन्यु देवता है। और यह महेन्द्र देवताओंके