निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ • अ० १ पा० १ ख० २ । गुण प्रकाशित करते हैं, और उन द्रव्योंके ही होते हैं, किन्तु दीपक के नहीं होते। उसी प्रकार उपसर्गसे भी धातुके ही अर्थ प्रतीत होते हैं, वे प्रकाशन-मात्रसे उपसर्गके नहीं होते। सर्वथा उपसर्ग स्वतन्त्रतासे अनर्थक ही है। गार्ग्यके मतमें उपसर्गकी अर्थवत्ता। (नि०) उच्चावचाः पदार्था भवन्तीति गार्ग्यः। तद्यएषु पदार्थः प्राहुरिमे तं, नामाख्यातयोरर्थविकरणम् । गार्ग्य आचार्य मानते हैं, कि उपसर्ग, नाम और आख्यातसे पृथक् होकर एकं एक भी बहुत प्रकारके अर्थोंके वाचक होते हैं, क्योंकि—प्र आदि शब्दोंके अतिशय आदि आदि अर्थ देखे जाते हैं ! उपसर्गोंकी अनर्थकतामे वर्णोंका दृष्टान्त भी युक्त नहीं है, क्योंकि वे वर्णोंकी अनर्थकताको अनुभव नहीं करते, प्रत्युत उनमें सामान्यरूप अभिधान शक्ति देखते हैं। जैसे—मृत्तिकाके अवयव 'मिलित होकर सम्पूर्ण (पूरे) भाण्डके बननेमे शक्ति रखते है, उसी प्रकार पदरूपसे समुदित हुए वर्णोंकी अर्थाभिधानमें शक्ति प्रकट होती है। सामान्य शक्ति उसे कहते हैं, जो कि-मिलित पदार्थों के द्वाराही प्रकट हो। जैसे किसी भारी शिलाको अनेक मनुष्य उठा सकते हैं, एक नहीं। यदि उनमें प्रत्येक मनुष्य अशक्त हों, तो मिलित होकर भी वे नहीं उठा सकते। यहां पर मिलित पुरुषोंके द्वाराही 'शिलाका उत्थानरूप कार्य देखा जाताहै, इससे उनकी वह सामान्य शक्ति कही जासकती है। यदि वर्ण अनर्थक होते, तो उनसे बना हुआ पद भी अन- र्थक ही होता। क्योंकि अशुक्ल तन्तुओंसे शुक्ल वस्त्र तैयार नहीं