निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५५ होता । और उन अनर्थक पदोंसे रचित हुआ वाक्य भी अनर्थक ही होता । एवम् अनर्थक वाक्योंसे बना हुआ शास्त्र भी अनर्थक हो होता और इसीप्रकार अभ्युदय तथा मोक्षके लिये विद्वानोंका यह उद्यम भी अनर्थक ही होता । किन्तु यह अनिष्ट है, इसलिए वर्ण अर्थवान् हैं यह मानना होगा । प्रदीप भी अपने प्रकाशरूप अर्थसे अर्थवान्ही है और इस प्रकार- से अर्थवान् होकर भी प्रकाश्य वस्तुको प्रकाशन करता हुआ अपनी प्रकाशन शक्तिको प्रकट करता है । इसी प्रकार उपसर्ग अर्थवान् होकर भी अपनी अनेककी विद्यमान अर्थाभिधान शक्तिको स्वार्था- भिधान शक्तिके आधारभूत नाम और आख्यातको जना करके अभिव्यक्त करेंगे । इसलिए प्रदीपकेसमान "उपसर्ग अनर्थक है" यह कहना अयुक्त है । नाम और आख्यातका ही अर्थ उपसर्गके संयोग होनेपर, प्रतीत होताहै, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि—लोकमें जो, जिसमें समर्थ है, वह उसमें अन्यकी अपेक्षा नहीं करता । जबकि—नाम और आख्यात अपनी क्रियामें किसी अर्थ-विशेषको जनानेके लिये उपसर्गके संयोगकी अपेक्षा करते हैं, तो अवश्यही क्रिया-विशेष अर्थ उपसर्गका, और क्रियासामान्य अर्थ आख्यातका उपपन्न. होताहै । पहिले यह जो कहा गयाहै कि—"नाम और आख्यातसे अलग रहकर उपसर्ग अनर्थक हैं।" सो ठीक नहीं है । क्योंकि इनका जो अनेक प्रकारका अर्थ है, उसको ये (पद-विशेष, उपसर्ग) अलग होकर भी कहते ही हैं, अर्थात् नाम और आख्यातके अर्थमें जो विकार या विशेष है, वही उपसर्गोंका अर्थ है, उसी अर्थसे ये अर्थवान् हैं, किन्तु अनर्थक नहीं ।