निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 52, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें,हिन्दी निरुक्त । ५१ जाते हैं, या पहिले ही घट हो जाता है, या शराव ही। तथा घटके बाद् शराव होता ही नहीं, एवम् यदि होता भी है तो घटके द्वारको उसको कुछ अपेक्षा नहीं किन्तु जो घटका मूल कारण मृत्तिका है,। उसीको अपेक्षा करता है, और घटकी अवस्थामें उसके भीतर वह बनता भी नहीं रहता, ठीक इसके विपरीत यह छः भाव विकार होते हैं। अर्थात् इनमें उत्तर उत्तरकी उत्पत्ति पूर्व पूर्वके द्वारा होती हैं, उत्तर भाव पूर्व भावके होनेसे पहिले नहीं होता, उत्तर भाव पूर्वभावकी अवस्थामे अपूर्णरूपसे क्रम क्रमसे बनता रहता है। इत्यादि। जैसे कारणभावसे पहिले जन्म-भाव- विकार उत्पन्न होता है और उसके द्वारा 'अस्ति' पदसे जाननेयोग्य सत्ता एवम् उसके द्वारा विपरिणाम होता है। क्योकि जो जात (जन्मा) नहीं है, वह 'अस्ति' नहीं कहा जा सकता, और जो विद्य- मान् नहीं वह 'विपरिणमते' नहीं कहा जाता है। सुतराम् छः भाव विकार, घट शराव आदि स्वतन्त्र स्वतन्त्र विकारोंके समान न होकर, परस्परकी अपेक्षा रखनेवाले शृङ्खलाबद्ध होते हैं। इसीसे ये सभी पैदाहोनेवाले प्रत्येक पदार्थमें सबके सब ही होते हैं। अर्थात् घटमें, पटमें तथा शराव आदि सकल जन्यमात्रमें सबमें आते हैं, और शृङ्खलाबद्ध। प्रयोजन यह है कि, होनेवाली प्रत्येक वस्तु कुछ आयु रखती है और उसमें ये छः परिवर्तन उक्त क्रमसे अवश्यम्भावी उन्हीके ये बोधक है—'जायते' 'अस्ति' 'विपरि- णमते' 'वर्धते' 'अपक्षीयते' तथा 'नश्यति' । अन्य भावविकार और उनका अन्तर्भाव । (नि०) अतोऽन्ये भावविकारा एतेषामेव भाव- विकारा भवन्ति—इति हस्माह। ते यथा- वचनमभ्यूहितव्याः ।