भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

४८ अ० १ पा० १ ख० २ । 'जायते' पदसे बोधन किया जाता है; उसके पश्चात् उत्पन्न हुएका सत्तारूप भावविकार आजाता है, उस अवस्था में 'घटः- अस्ति' 'पटः अस्ति' ऐसे व्यवहार होने लगते हैं। अर्थात् उसकी विद्य- मानता अब उक्त पदसे सुप्रकट रूपमें कही जाती है। तथा उसके साथ तीसरा परिणाम भाव विकार क्रमसे बन रहा है। सब पूर्व या अपर भाव अपने कारणमें एक क्षण या सूक्ष्म काल तक बनते रहते हैं, दूसरे क्षणमें अपने पूर्णरूपमें प्रकट होकर रहते हैं और उसके अनन्तर तृतीय क्षणमें लय होजाते हैं। अपर या उत्तर भाव विकार पूर्वभावके स्थिति क्षणमें गर्भमें रहता है, तथा उसके तृतीय क्षणमें आत्मलाभ करलेता है, जो इस अपर भाव- का द्वितीय क्षण कहा जासकता है। यही प्रकार अन्यत्र २ विचारमें रखना होगा। तीसरा भावविकार और उसमें चतुर्थ भावविकारका आरम्भ। (नि०) विपरिणमते इत्यप्रच्यवमानस्य तत्त्वाद्विकारम्। दूसरे भावका तीसरा क्षणहै और प्रथम भावका चतुर्थ। इस समय दूसरा सत्ता भाव जो अस्तिका बोध्यहै, लय होचुका तथा तीसरा परिणाम भाव पूर्णरूपमें प्रकट और 'विपरिणमते' इस आख्यात पदसे कहने योग्यहै। अर्थात् कोई भी वस्तु या शरीर जब एक अवस्थाकी पूरी सत्ता प्राप्त करलेता है, तो उसे अब और बढ़ना चाहिये, किन्तु वह वृद्धि तबतक नहीं होसकती, जबतक कि जो वस्तु अपनी विद्यमान अवस्थाको छोड़ना स्वीकार न करे। मानलो कि—एक बालकका शरीर बढ़ना चाहताहै किन्तु अपनी उस अवस्थाको छोड़ना भी नहीं चाहता, तो यह सर्वथा असम्भव है, जब वह उस अवस्थाको छोड़ेगा, तभी बढ़ेगा, इससे वृद्धिके लिए जो अपनी विद्यमान अवस्थाको छोड़ना है, वही विपरिणाम