भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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• हिन्दी निरुक्त । ४६ . नामवाला तीसरा भावविकार है, इसीके गर्भमें वृद्धिनाम चतुर्थ भावविकार क्रमसे अपनी पूर्तिकी ओर चल रहा है। अर्थात् यह विपरिणाम भाव क्या है ? वृद्धिका अव्यक्तरूप ही है। ⸱ चतुर्थ भावविकार और उसमें पञ्चम भावविकारका आरम्भ। (नि०) वर्द्धते—इति स्वाङ्गाभ्युच्चयं सांयोगिकानां वर्द्धते विजयेनेतिवा, वर्द्धते शरीरेण,-इति वा। अङ्गोंका बढ़ना अथवा बाह्य पदार्थ धनकीर्त्ति आदिका बढ़ना 'वृद्धि' नाम भाव विकार होता है। जिसका उदाहरण अङ्ग वृद्धिमें 'वर्द्धते शरीरेण' शरीरसे बढ़ता है, और बाह्य वृद्धिमें 'वर्द्धते विजयेन' विजयसे बढ़ता हैं—हो सकता है। चतुर्थ भावका दूसरा क्षण है, और तीसरेका विपरिणाम भाव का तीसरा क्षण है, वह लय हो गया, तथा वृद्धिभावकी स्थिति है, इसको 'वर्द्धते' इस आख्यातसे कहा जाता है। इस वृद्धिरूप भाव विकारके स्थिति कालमे पांचवा भाव गर्भमें है, उसके क्षण के पूरे होने तक यह ( अपक्षय ) भाव आत्मलाभमें समर्थ हो जायगा। भाव यह है कि- वृद्धिके साथ अपक्षयके सूत्र भी फैलते जाते हैं, इसीसे वृद्धिका कालगत होते ही अपक्षय (क्षीणता) पूर्णरूपमें प्रकट हो जाता है। पञ्चम भावविकार और उसमें षष्ठभाव विकारका आरम्भ। ( नि० ) अपक्षीयते-इत्येतेनैव व्याख्यातः प्रतिलोमम् । अपक्षयनाम पांचवां भावविकार, ठीक वृद्धिका उलटा रूप है, जिस प्रकार अंगोंके फैलनेसे शरीरकी वृद्धि होती है, वैसे ही अंगोंके ह्रासके साथ शरीरमें अपक्षय नाम भाव विकार होता है। यह अपक्षय विकार क्या है ? विनाशरूप अपर भावका पूर्वरूप. मात्र है। इसी बातको दूसरे रूपमें यों कहा जाता है कि-इस