निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 25, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ अं० १ पा० १ खं० १ । • इसके अतिरिक्त 'देवदत्तः पचति' 'ओदनः पच्यते' ( 'देवदत्त पकाता है, ओदन पकाया जाता है) इन वाक्योंमें द्रव्यवाचकता या द्रव्यके सामानाधिकरण्यके कारण क्रियामें विकृति होती है, अन्यथा उस विकृतिका मूल ही क्या है। अपि च "लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः” “कर्त्तरि शप्” । इत्यादि अनेक पाणिनि सूत्र इसका साक्ष्य भी देते हैं कि- आख्यातमें द्रव्य-वाचकता रहती है। लिङ्गकी विकृतिका अभाव भी पूर्णरूपसे प्रमाण नहीं हो सकता कि--'आख्यात द्रव्यवाचक नहीं', क्योंकि कति और युष्मद्-अस्मद् आदि बहुत द्रव्यवाचक शब्द ऐसे है, जिनमें लिङ्ग की विकृति नही देखी जाती जैसे-'त्वं पुमान्' 'त्वंस्त्री' 'त्वं ब्रह्म' 'कति पुरुषाः' 'कति स्त्रियः' 'कति कुलानि' इत्यादि । • यह कहें कि-- कति आदि शब्दोमे लिङ्ग है, किन्तु प्रतीत नहीं होता, तो हम भी 'पचति' आदिके लिये यह कह सकते है, इस लिये यह शब्दका स्वभाव है कि-कहीं लिङ्गकी विकृति प्रतीत होतो है, और कहीं नहीं। जब कि-पच् धातुसे लट् लकार होता है, और वह 'शतृ' आदेश होनेकी अवस्था में द्रव्यवाचक स्वीकृत है, तो तिप् आदेश- की अवस्था में उस लट्के अर्थको कौन उड़ा ले जायगा, या उड़ भी जाता है, तो उसमें क्या प्रमाण है ? अपि च 'देवदत्तः पचति' यहा पर पचति द्रव्यवाचक नहीं तो देवदत्त शब्दमें प्रथमा विभक्तिका क्या मूल है ? और पचति पचसि तथा पचामि में पुरुष नियम किसने किया ? • यदि इन सब बातोंका मूल निकालेंगे तो आप समझेंगे कि- आख्यातमें द्रव्य-वाचकता है, या द्रव्य-प्रधानता है, या नहीं।