भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पठति' 'ब्राह्मणी पठति' तथा 'ब्राह्मणकुलं पठति' इन तीनो ही वाक्योंमें पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग एवम् नपुंसकलिङ्ग पदोंके साथ लग कर भी एक ही रूपसे रहते है, इसका कारण यही हो सकता है कि—वह द्रव्य—प्रधान नहीं है। इस द्रव्य प्रधानताके खण्डनसे भी परिशेषसे आख्यातमें क्रिया प्रधानता ही आती है। इसी अभिप्रायसे किसी प्राचीन आचार्य्यने कहा है— "क्रियावाचक माख्यातं, लिङ्गतो न विशिष्यते । त्रींश्च पुरुषान्विद्यात् कालतस्तु विशिष्यते ॥ आख्यात क्रिया—वाचक या क्रियाप्रधान है। (द्रव्यवाचक नहीं) क्योकि इसमें लिङ्गकी विशेषणता नही देखी जाती। जैसे कि—हिन्दीभाषामें 'पकाता है' 'पकाती है' इत्यादि। इसके अतिरिक्त—३ पुरुषो और कालका योग भी आख्यातके क्रियाप्रधान होनेका मूल है। अर्थात् द्रव्यवाचक नाम पदोंमे प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष तथा भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान कालकी विशेषणता नहीं देखी जाती, यह विलक्षणता भी आख्यातके क्रियाप्रधान होनेमें कारण है। प्रश्न। शाब्दिक लोगोंने लिङ्ग और संख्याके सम्बन्धको द्रव्यका लक्षण बताया है, क्योंकि—संख्या और लिङ्ग ये दोनो ही द्रव्यके धर्म हैं, हम जहां तक समझतेहै, इसी सिद्धान्तके अवलम्बन पर यह वचन उतरा है, किन्तु कोई यह भी सिद्ध नहीं कर सकता कि—'अकेली संख्या भी किसी अद्रव्य पदार्थमें रह सकती है' इस लिए जब कि—आख्यातपदोंमें 'पचति' पचतः, पचन्ति' इत्यादि रूपसे संख्याका योग व्यापक है, तो वे क्यों नहीं द्रव्यवाचक समझे जाते ? जैसे कि—घटः घटौ घटाः । अर्थात् 'पकाता है' और 'पकाते हैं' ऐसे प्रयोगोमें संख्याकां प्रभाव स्पष्ट प्रतीत होता है।