निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ अ० १ पा० ६ ख० २ । नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा । यद्गृहीतमवि- ज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविवशुष्कैधो न तज्ज्वलतिकर्हिचित् । (शिष्टाचारस्मृतिः) लोक और वेदमें। लोकमें जो कोई विद्वान् होता है, वह पुण्यफलार्थी जनोंसे पूजित होता है। यह तो प्रत्यक्षमें देखा ही जाता है। किन्तु शास्त्रमें भी ऊपरिलिखित वाक्य है। जैसे—वृक्ष अपने पत्र-पुष्प-फलोंके धारण करनेका ही भागी है, किंतु उनके, गन्ध-रस-रूप तथा स्पर्शके उपभोग सुखोंसे संयुक्त नहीं होता। ऐसे ही वह पुरुष है, जिसने वेद पढ़कर उसका अर्थ नहीं जाना। जो पुरुष अर्थ को भी जानता है, किन्तु केवल पाठ- मात्रका पढ़नेवाला नहीं है, वह पुरुष ही सकल (अखण्डित) कल्याणको भोगता है। और क्या ? इस लोकमें शिष्ट पुरुषोंका पूज्य होकर अन्तमें स्वर्गमें जाता है, जहां दुःखका नाममात्र भी नहीं है। वह पुरुष ऐसे स्थानमें क्यों जाता है ? स्वर्गमें जानेके विरोधी जितने पाप हैं वे सब उसके ज्ञानसे नष्ट हो जाते हैं। इससे वह स्वर्गमें जाता है। जैसा कि कहा है-- “नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।” अर्थ--'ज्ञानके समान इस संसारमें और कुछ भी पवित्र नहीं है। अथवा स्थाणु नाम गधेका है, वह जिस प्रकार चन्दनभारको ढोता है, किन्तु उसके गन्धका उपभोग नहीं करता ऐसे ही वह पुरुष है जो अर्थ को नहीं जानता। अज्ञानकी निन्दा-- जो गुरुमुखसे अर्थ के बिना शब्दमात्रसे पढ़ता है, तथा नित्य काल ही उच्चारणमात्र करता रहता है, किन्तु कभी उसके अर्थ का