निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १५३ विचार नहीं करता, जिस प्रकार सूखा काष्ठ अग्निसे अन्यत्र कभी नहीं जलता, ऐसे ही वह पुरुष वेदाध्ययनके भारमात्रसे सम्बन्ध रखता है किन्तु उसके फलसे नहीं । इससे फलित यह हुआ कि--परिज्ञान, पुरुषको श्रेय तथा अभ्युदयसे संयुक्त करता है, इसलिये निरुक्त शास्त्र आरम्भ करने योग्य है । “स्थाणु” और “अर्थ” शब्दका निर्वचन । ( नि० ) स्थाणुः तिष्ठतेः । अर्थः ऋत्तेः । अरणा- स्थोवा ॥ २ ॥ स्थाणुः-क्योंकि यह सदा ही स्थित या खड़ा रहता है, किन्तु कभी बैठता नहीं। इसलिये यह 'स्थाणु' है। ष्ठा (स्था ) गति निवृत्तौ धातुसे बनता है । अर्थः-( १ ) क्योंकि-अर्थी लोग इसे सदा ही प्राप्त करते रहते हैं, इससे यह अर्थ कहाता है। ऋ गतौ धातुसे बनता है। - ( २ ) जब इस (अर्थ) का स्वामी इस लोकसे परलोकको जाता है, तब यह उसके साथ न जाकर इसी लोकमें रह जाता है, इससे यह रुपये अशरफी अर्थ कहाते हैं। इसके सादृश्यसे शब्दका अर्थ भी अर्थ कहलाता है। ( सं० ३ ) “उतत्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुतत्वः शृण्वन्न शृणो- त्येनाम् । उतोत्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्यउ- शती सुवासाः । अप्येकः पश्य न्, न पश्यति वाचम्, अपिच शृ- ण्वन् न शृणोति एनाम् ।—इति अविद्वांसमाह २०