निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १४५ कोई पढ़नेवाला देखता हुआ भी अर्थके अज्ञानसे नहीं देखता है। क्योंकि—वही पुरुष उस वाणीको देखता है, जो उसके अर्थको जानता है। क्योंकि—वाणीमें अर्थ ही कला, या सार है। इसी प्रकार एक सुनता हुआ भी नहीं सुनता है। क्योंकि—जो अर्थको जानता है, उसको वह ठीक सुनाई देती है, किन्तु, दूसरेको नहीं। वह केवल वाणीको उच्चारणमात्र करता है। अब उत्तर-आधी ऋचासे अर्थके जाननेवालेकी प्रशंसा करता है। एक, किसी अर्थज्ञके लिये वाणी अपने शरीरको खोलकर दिखाती है, अर्थात् अर्थ, वाणीका शरीर होता है, उसको उद्घाटन कर अपने आत्माको दिखा देती है। जिस प्रकार ऋतुकालमें रजसे शुद्ध होकर, कामयुक्त स्त्री सुन्दर वस्त्र धारण करके वाञ्छित पतिको अपने आपेको दिखाती है, क्योंकि—उस समय उसको बहुत ही पुरुषकी इच्छा होती है। और जिस प्रकार पुरुष उसको यथावत् देखता है, जैसा कि—और स्त्रीको नहीं देखता, जिसने अपने शरीरको बहुत ही गुप्त कर रखा है, अथवा जो अपने आत्माको उसे दिखाना नहीं चाहती। ऐसे वही पुरुष इस वाणीको ठीक ठीक सुनता है, जो इसको पदोंसे खोल कर इसके समस्त अर्थको देखता है। तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ३ ॥ उसकी अधिक व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥ ३॥ ( खं० ४ ) उतत्वं॒ सख्ये॑ स्थिरपीतमाहुर्नैनं॑ हिन्वन्त्यपि वाजिनेषु । अधेन्वा चरति माययैष वाचं शुश्रुवाँ॑ अफलामपुष्पाम् ॥ अपि एकं वाक्-सख्ये स्थिर पीतमाहुः । रसमार्थं निपीतार्थम्।