निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ अ० १ पा० ६ ख० ४ । देवसख्ये, रमणीये स्थाने इति वा । विज्ञातार्थं य न आप्नु- वन्ति, वागेऽज्ञेयेषु बलवत्सु अपि । अधेन्वा हि एष चरति मायया वाक् अतिरूपया, नास्मै कामान् दुग्धे वाग्-दोहान्, देव मनुष्य- स्थानेषु । यो वाचं श्रुतवान् भवति, अफलाम् अपुष्पाम्, इति । अफला अस्मै अपुष्पा वाग् भवति,-इतिवा । किंचित्पुष्पफला,- इति वा । अर्थं वाचः पुष्पफलमाह, याज्ञ दैवते पुष्पफले, देवता- ध्यात्मे वा ॥ ४ ॥ अनुवाद । “उतत्वम्” [ ऋ० स० ८, २. २४, ४ ] [ १म पदार्थ-] किसी एकको विद्वद्गोष्ठी = पण्डितोंकी सभामें स्थिर-पीत कहते है । स्थिर नाम रममाण या निर्भयतासे डटा हुआ, पीत नाम जिसने अर्थको पान या धारण किया । [ मन्त्रमें ] अथवा सख्य नाम जिसमें देवताओंको प्रीति हो, उस रमणीय स्थानका है । [ २य पा- दार्थ-] उस [ जिस ] अर्थके जाननेवालेको वाणीसे जाने जानेवाले गम्भीर अर्थोमे अन्य पुरुष बिलकुल नहीं पहूंचते । [ ३य पाद- ] [ अविद्वान्को निन्दा- ] वह नहीं दुहनेवाली वाणीरूप मायाके साथ फिरता है । [ एकपद निरुक्त ] [ अधेनु ] इसके लिये वाणीसे दोहेजानेवाले कामोंको नहीं देती । [ कहां ] देवस्थान = परलोकमे, और मनुष्यस्थान = इस लोकमे । [ चतुर्थ पदार्थ ] जो निष्फल और पुष्परहित वाणीको सुननेवाला है । [ अर्थान्तर ] अथवा इस ( अविद्वान् ) के लिये वाणी फलरहित और पुष्परहित हो जाती है [ अर्थान्तर ] अथवा कुछ पुष्प और फल देती है । [ ऋषि ] अर्थको वाणीका पुष्प और फल कहता है । यज्ञका विज्ञान पुष्प और देवता-विज्ञान फल है । अथवा देवता विज्ञान पुष्प और आत्मविषयक ज्ञान फल है ॥ ४ ॥