भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 155

हिन्दी निरुक्त । १५७ व्याख्या । "उतत्व" [ ऋ० सं० ८, २, २१, ५ ] । 'जिस पुरुषने वेदार्थको जानकर अपने आत्मामे स्थिर कर लिया है, उसका वेदवाणा विद्वद्-गोष्ठोमें, जहा बहुत विद्वान् किसो अर्थ- को विचार रहे हैं, एकहीको अनेक विद्वान् कहती है, अर्थात् उस एक पुरुषका कहा हुआ अनेक विद्वानोंके कहे हुएके समान है । परिशिष्ट (१३, १३) मे कहा है कि-विद्वान् पुरुष जिस जिस देवता- का निर्वचन करता है, उस उस देवताके भावको प्राप्त होता है। इसीसे विद्वान् अनेक देवताओके निर्वचन करनेसे अनेक देवतारूप होता है । अथवा सख्य नाम देवताओके प्यारे देवलोकका है, वेदवाणी कहती है कि-"अर्थज्ञ पुरुषका देवलोकमे अक्षय निवास होता है। किञ्च मन्दबुद्धि पुरुष, वेदके उन दुर्ज्ञेय वा दुरवघटनीय देवता परिज्ञानादि अर्थोंमें जो समुद्रमें छिपे हुए रत्नोंके समान हैं, इस अर्थज्ञ विद्वान्‌के पीछे नही जा सकते । भाव यह है कि- जिस अर्थको वह अकेला खोल सकता है, उस अर्थको बहुतसे भी मन्दबुद्धि आकर नहीं कह सकते । यह उसका स्वतन्त्र संस्कार है, वह देखादेखी उसके समान अध्ययनादि लभ्य नहीं है। उत्तरार्द्धसे अविद्वान्‌की निन्दा- वाणो उस पुरुषके सङ्ग, इस लोक तथा परलोकमे नहीं जाती, जो इसके अर्थको नही जानता । किञ्च-जिस प्रकार कोई पुरुष मायासे सुवर्णको धारण करे, वैसे ही अनर्थ ज्ञ पुरुष इस वाणी- को धारण करता है। वह वाणी उस पुरुषके लिये उन कामोको नहीं दुहातो, जो उससे देवलोक या मनुष्यलोकमें दोहे जा सकते हैं। जिसने पुष्प और फल रहित इस वाणीका श्रवण किया है अर्थात् दृढ आग्रहके साथ मान लिया है, कि-' पाठमात्रके अति-

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