निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ अ० १ पा० ६ ख० ४ । रिक्त और कुछ इसमें नहीं है” उसके लिये यह वेदवाणी वैसी अफला तथा अपुष्पा हो जाती है, जैसा उसने देखा है या उसका भाव है। अथवा “अफला” “अपुष्पा” का यह अर्थ है, कि—किञ्चित्- फला तथा किञ्चित्पुष्पा हो जाती है। सर्वथा यह परिश्रम व्यर्थ ही नहीं है। यह भाष्यकारका अभिप्राय है। पुष्प-फल । वाणीका अर्थ ही उसका पुष्प तथा फल होता है। याज्ञ, दैवत और अध्यात्म यह वाणीका समुदित अर्थ है। उसीको रूपकल्पनासे मन्त्रद्रष्टा ऋषि, पुष्प और फल रूप दो विभागोंमें कहता है।—“याज्ञ दैवते पुष्पफले” “दैवताध्यात्मे वा” याज्ञके परिज्ञानको याज्ञ कहते है। देवताके परिज्ञानको दैवत, तथा आत्मविषयक ज्ञानको अध्यात्म कहते है। मन्त्र-ब्राह्मणरूप सम्पूर्ण वेदराशि इन तीन अर्थोंमें बटा हुआ है। जब अभ्युदयरूप धर्मके अभिप्रायको लिया जाता है, तो याज्ञ पुष्प, और दैवत फल है। क्योंकि—पहिले पुष्प ही फलके लिये होता है और फिर वही पुष्प फल रूपसे परिणत होता है। इसी प्रकार यज्ञ भी देवताके लिये पहिले किया जाता है, इस सादृश्यसे याज्ञ पुष्प और दैवत फल है। और जब निःश्रेयस (मोक्ष) रूप धर्मके अभिप्रायको लिया जाता है, तब यज्ञ-दैवत दोनों अर्थ, पुष्प स्थानमें गिने जाते हैं, क्योंकि—दैवतके भीतर ही याज्ञ भी आ जाता है, जिसमें कि— वह उसीके लिये है इसलिये अलग नहीं कहा जाता। और अध्यात्म फल है। क्योंकि—उपासक या मुमुक्षु पुरुष अपने संस्कार युक्त-ज्ञानसे सम्पूर्ण दैवत ज्ञानको आत्माके ही प्रति सम्पादन करता है, जिस प्रकारसे कि—“अधियज्ञ और अधिदैवत सब