निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १५६ उच्छिन्न (लीन) होकर कार्य-कारणके अधिदेवताओंके द्वारा अध्यात्म ही बन जाता है। जिस प्रकार घटाकाश मठाकाशमें लय हो जाता है, और मठाकाश महाकाशमें, तथा जिस प्रकार पुष्प भावको त्याग करके पुष्प, फल भावके लिये हो जाता है, उसी प्रकार अधियज्ञ और अधिदैवत सब अध्यात्मभावको धारण कर लेते हैं। इससे याज्ञ और दैवत पुष्पस्थानमें हैं और अध्यात्म फलस्थानमें ॥ ४ ॥ ( खं० ५) साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः । ते अवरेभ्यः असाक्षात्कृत- धर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः । उपदेशाय ग्लायन्तः अवरे बिल्म, ग्रहणाय इमं ग्रन्थं समाम्नासिषुः, वेदं च वेदाङ्गानि च । बिल्मं, भिल्मं, भासनम्, इति वा । एतावन्तः समानकर्माणो धातवः । धातु- र्दधातेः । एतावन्ति अस्य सत्वस्य नामधेयानि । एतावताम् अर्थानामिदम् अभिधानम् । नैघण्टुकमिदम् । देवतानामप्राधान्येन इदम्,-इति । तद्यत् अन्यदैवते मन्त्रे निपतति, नैघण्टुकं तत् ॥ ५ ॥ अनुवाद । धर्मके प्रत्यक्ष देखनेवाले ऋषि हुए । उन्होंने पीछे होनेवाले तथा धर्मको साक्षात्कार न करनेवाले ऋषियोंके लिये उपदेश धर्मसे मन्त्रोंको दिया । पीछे होनेवाले ऋषियोंने उपदेशके लिये ग्लानि करते हुए बिल्मसे ग्रहणके लिये इस ( निघण्टु ) ग्रन्थको और वेद तथा वेदाङ्गोंको समाम्नान किया । बिल्म नाम छान बीन या प्रकाश का है। [ निघण्टुका लक्षण ] (जहां ) इतने धातु समान अर्थवाले हैं । 'धातु' शब्द 'डुधाञ् ' धारणपोषणयोः, धातुसे बनता है। इस द्रव्यके इतने नाम हैं, ऐसा ऐसा बताया जावे । यह [ ऐकपदिक या नैगमकाण्डका लक्षण ] जहां इतने अर्थोंका यह नाम है, और इसके अतिरिक्त यह नैघण्टुक (नाम) है, या देवता-