भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१६० अ० १ पा० ६ ख० ५ ।

ओंके अप्राधान्यसे, यह है, यह भी दिखाया जावे । [ यह नैगम- काण्ड ] अन्य देवताके मन्त्रमें उसीकी प्रशंसाके लिये दूसरे देवता का नाम आजावे उस नामको 'नैघण्टुक' कहते हैं । [ यह 'नैघण्टुक' शब्द आद्य प्रकरणके लिये नहीं बल्कि-शब्द विशेषोंके लिये है, जो नैगम काण्डमें बताये जावेंगे ।] ॥ ५ ॥ व्याख्या । निरुक्तकी प्रधानता । उत्पत्ति और उसका प्रयोजन । पूर्व ऋषि और अवर ऋषि । जिन्होंने अपने तपोबलसे धर्मका साक्षात्कार किया है, ऐसे साक्षात्कृतधर्मा पूर्व ऋषि हुए हैं। अर्थात् पूर्व ऋषि जो सब ऋषि- योंसे पहिले हुए थे, उन्होंने किसी पुरुषान्तरसे मन्त्रोंका श्रवण, नहीं किया था, अपितु विनाही श्रवणके तपोमात्रसे मन्त्रोंका दर्शन किया था। धर्मके साक्षात्कारसे, धर्मसे उत्पन्न होनेवाले सुखोंके साक्षात्कारसे है, कि-उन्होंने धर्मसे उत्पन्न होनेवाले फलोंका प्रत्यक्ष दर्शन किया था, इसीसे वे वेदार्थ व धर्मके सम्बन्धमें सर्व प्रकारसे सन्देहरहित थे। उन्हीं साक्षात्कृतधर्मा पूर्व ऋषियोंने अवर या उनसे पीछे होने- वाले ऋषियोंको ग्रन्थ तथा अर्थ दोनो ही रूपसे मन्त्र दिये । इन ऋषियोंको पूर्व ऋषियोंके समान बिना ही श्रवणके मन्त्रोंका दर्शन नहीं हुआ था, अपितु पूर्व ऋषियोंसे श्रवणके द्वारा ही मन्त्र प्राप्त हुए थे, इससे पूर्व ऋषियोंकी अपेक्षा इनका “श्रुतर्षि” यह विशेष नाम होता है । किन्तु उनमे भी उनसे पीछे होनेवाले पुरुषोंकी अपेक्षा इतना महत्व हुआ कि-उन्होने उपदेशमात्रसे ही अर्थ सहित मन्त्रोंका ग्रहण कर लिया, उनके लिये पूर्व ऋषियोंको उनके सम- झानेके लिये कुछ विशेष उपायोका अवलम्बन नहीं करना पड़ा और