निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्तः । १६१ न उन्होंको कुछ मन्त्रों या अर्थोंका श्रोषण करना पड़ा।। तात्पर्य यह कि-वे अन्तःकरणकी अति पवित्रताके एक बारही कथनमात्रसे ज्ञातव्य अर्थका ग्रहण तथा धारण करनेमें समर्थ हुए थे । उन श्रुतर्षि महापुरुषोंने अपनेसे पीछे होनेवाले पुरुषोंको देखा कि-ये अल्पायु और मन्दबुद्धि हैं, इससे ये हमारे समान वेद व वेदार्थको संकेतसे बताने मात्रसे नहीं समझेंगे, इसके कारण ग्लानि तथा खेदको प्राप्त होते हुए, ऋषियोंने अवरजनों पर परम अनुकम्पा करके गो आदि देवपत्नी पर्यन्त ( १७७० ) शब्दोंके संग्रह स्वरूप ग्रन्थका निर्माण किया । यही नहीं किन्तु इसके अतिरिक्त वेद और वेदाङ्गोका भी समाम्नान किया । प्रयोजन यह कि-पहिले एक ही वेद था, इसलिये वह अतिमहान् और पढ़नेमें कठिन था । इसलिये उसकी अनेक शाखाभेदसे समाम्नान किया । भगवान् व्यासदेवने अवर पुरुषोके सुखपूर्वक ग्रहणके लिये यह महाप्रयत्न किया था। जैसे कि-ऋग्वेदकी इक्कीस ( २१ ) शाखा, यजुर्वेदकी एक सौ ( १०० ) सामवेदकी सहस्र ( १००० ) तथा अथर्ववेदकी नो ( ६ ) शाखाएं कर दीं। इसी प्रकार ऋषियोने वेदाङ्गोका भी विभाग कर दिया।। जैसे कि- व्याकरण आठ ( ८) प्रकार और निरुक्त चोदह प्रकारका करदिया । ऐसा करदेनेसे सबके छोटे छोटे रूप होगये । "शक्तिहीन तथा अल्पायु पुरुष यथाप्रयोजन सुखपूर्वक पढ़ सकेंगे", यही प्रयोजन इस प्रयत्नका था। “बिल्म” शब्द भाष्यका है, उसका निर्वचन स्वयम् करते हैं— (क) बिल्म नाम भिल्म. वेदोका भेदम या व्यासका है। (ख) भाषण २१