भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 160

१६२ अ० १ पा० ५ ख० ५ । (ग) भाषण (प्रकाशन) क्योंकि-वेदाङ्गोंके ज्ञानसे वेदका अर्थ प्रकाशित होता है । उक्त व्युत्पत्तियोंके अनुसार "बिल्म" शब्द "भिद्" या "भास्" धातुसे बनता है । निघण्टुशास्त्रकी विरचना । "निघण्टु" शास्त्रकी रचना तीन भागोंमें कीगई है । १-पहिला भाग "नैघण्टुक" है। जिसमें "इस द्रव्यके इतने नाम हैं" "इतने समान अर्थ वाले धातु हैं" ऐसी ऐसी पदोंकी राशि दिखाई गई हैं । इस प्रकरणमें 'इतने इस द्रव्यके नाम हैं'इस प्रकार जो नामों- की संख्या बताई गई है, वह उसी प्रकार स्वीकार करने योग्य है। जैसे कि-"पृथिवीके इक्कीस (२१) नाम हैं" यहां इक्कीस (२१) संख्या ग्राह्य है । इसी प्रकार धातुओंमें जो संख्या बताई है वह भी उसी प्रकार ग्राह्य है। जैसे- "गति- कर्म्माण उत्तरे धातवो द्वाविंशतशतम्" 'आगेके एकसौ बाईस (१२२) गति अर्थ वाले धातु हैं' तथा "कान्तिकर्म्माण उत्तरे धातवोऽष्टादश" 'आगे अठारह, (१८) कान्ति अर्थ वाले धातु हैं' यह १८ संख्या है। इत्यादि । अर्थात् जहां उपर्युक्त दोनों बाते या और कुछ प्रसङ्ग प्राप्त विचारा जावे, वह नैघण्टुक काण्ड है । "गौः" पदसे "जहा" शब्दसे पूर्व जितने शब्द हैं, वे उक्त सज्जानसे बोले जाते हैं । २-दूसरा भाग "नैगम" या "ऐकपदिक" काण्डके नामसे बोला जाता है। इस काण्डमे "इतने अर्थोंका यह नाम है" यह अर्थ विचारा जाता है। जैसे- "आदित्य भी 'अकूपार' है" और "समुद्र भी 'अकूपार'है" ऐसे ऐसे अनवगत संस्कार "जहा" आदि निगम शब्द विचारे जाते हैं । जिनका अर्थ

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