निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १६३ मन्त्र आदिके लक्ष्य पर निर्णय करके सस्कार स्थिर किया जाता है कि—यह किस धातु और किस प्रत्ययके योगसे बनना चाहिये। प्रसंगसे अन्य अन्य भी उपयुक्त बातें विचारी जाती हैं। जिन शब्दोंके निर्वचनसे यह प्रतीत होता है कि—इनके प्रधान या विशेष्य मन्त्रोंमें और और पद भी है, ऐसे शब्दोंके निर्वचनका जो भाग है, वह नैगम या ऐकपदिक कहा जाता है। “नैघण्टुक” शब्दका अर्थ । जो पद अन्य देवताकी प्रधानतावाले मन्त्रमें, उस देवताका विशेषण होजाता है, वह नैघण्टुक (गौण) कहलाता है। अर्थात् इस शास्त्रमें ऐसे पदोंकी “नैघण्टुक” यह संज्ञा है ॥५॥ (खं० ६) “अश्वं न त्वा वारवन्तम् ।” अश्वमिव त्वावाल- वन्तम् । ‘वाला:’ दंशवारणार्था भवन्ति । ‘दंश:’ दश्यतेः । मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः” । मृग इव .भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । “मृगः” मार्ष्टे र्गतिकर्मणः । “भीमः” बिभ्यति अस्मात् । ‘भीष्मः’अपि एतस्मादेव । “कुचरः,”-इति, चरति कर्म कुत्सितम् । अथ चेद् देवताभिधानम्-क्काऽयं न चरति, इति । “गिरिष्ठाः” गिरिस्थायी । ‘गिरिः’ पर्वतः । समु- द्गीर्णो भवति । पर्ववान् ‘पर्वतः’ । ‘पर्व’ पुनः पृणातेः । प्रीणातेर्वा । अर्द्धमासपर्व। देवान् अस्मिन्