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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त । १५७ व्याख्या । "उतत्व" [ ऋ० सं० ८, २, २१, ५ ] । 'जिस पुरुषने वेदार्थको जानकर अपने आत्मामे स्थिर कर लिया है, उसका वेदवाणा विद्वद्-गोष्ठोमें, जहा बहुत विद्वान् किसो अर्थ- को विचार रहे हैं, एकहीको अनेक विद्वान् कहती है, अर्थात् उस एक पुरुषका कहा हुआ अनेक विद्वानोंके कहे हुएके समान है । परिशिष्ट (१३, १३) मे कहा है कि-विद्वान् पुरुष जिस जिस देवता- का निर्वचन करता है, उस उस देवताके भावको प्राप्त होता है। इसीसे विद्वान् अनेक देवताओके निर्वचन करनेसे अनेक देवतारूप होता है । अथवा सख्य नाम देवताओके प्यारे देवलोकका है, वेदवाणी कहती है कि-"अर्थज्ञ पुरुषका देवलोकमे अक्षय निवास होता है। किञ्च मन्दबुद्धि पुरुष, वेदके उन दुर्ज्ञेय वा दुरवघटनीय देवता परिज्ञानादि अर्थोंमें जो समुद्रमें छिपे हुए रत्नोंके समान हैं, इस अर्थज्ञ विद्वान्‌के पीछे नही जा सकते । भाव यह है कि- जिस अर्थको वह अकेला खोल सकता है, उस अर्थको बहुतसे भी मन्दबुद्धि आकर नहीं कह सकते । यह उसका स्वतन्त्र संस्कार है, वह देखादेखी उसके समान अध्ययनादि लभ्य नहीं है। उत्तरार्द्धसे अविद्वान्‌की निन्दा- वाणो उस पुरुषके सङ्ग, इस लोक तथा परलोकमे नहीं जाती, जो इसके अर्थको नही जानता । किञ्च-जिस प्रकार कोई पुरुष मायासे सुवर्णको धारण करे, वैसे ही अनर्थ ज्ञ पुरुष इस वाणी- को धारण करता है। वह वाणी उस पुरुषके लिये उन कामोको नहीं दुहातो, जो उससे देवलोक या मनुष्यलोकमें दोहे जा सकते हैं। जिसने पुष्प और फल रहित इस वाणीका श्रवण किया है अर्थात् दृढ आग्रहके साथ मान लिया है, कि-' पाठमात्रके अति-

१५८ अ० १ पा० ६ ख० ४ । रिक्त और कुछ इसमें नहीं है” उसके लिये यह वेदवाणी वैसी अफला तथा अपुष्पा हो जाती है, जैसा उसने देखा है या उसका भाव है। अथवा “अफला” “अपुष्पा” का यह अर्थ है, कि—किञ्चित्- फला तथा किञ्चित्पुष्पा हो जाती है। सर्वथा यह परिश्रम व्यर्थ ही नहीं है। यह भाष्यकारका अभिप्राय है। पुष्प-फल । वाणीका अर्थ ही उसका पुष्प तथा फल होता है। याज्ञ, दैवत और अध्यात्म यह वाणीका समुदित अर्थ है। उसीको रूपकल्पनासे मन्त्रद्रष्टा ऋषि, पुष्प और फल रूप दो विभागोंमें कहता है।—“याज्ञ दैवते पुष्पफले” “दैवताध्यात्मे वा” याज्ञके परिज्ञानको याज्ञ कहते है। देवताके परिज्ञानको दैवत, तथा आत्मविषयक ज्ञानको अध्यात्म कहते है। मन्त्र-ब्राह्मणरूप सम्पूर्ण वेदराशि इन तीन अर्थोंमें बटा हुआ है। जब अभ्युदयरूप धर्मके अभिप्रायको लिया जाता है, तो याज्ञ पुष्प, और दैवत फल है। क्योंकि—पहिले पुष्प ही फलके लिये होता है और फिर वही पुष्प फल रूपसे परिणत होता है। इसी प्रकार यज्ञ भी देवताके लिये पहिले किया जाता है, इस सादृश्यसे याज्ञ पुष्प और दैवत फल है। और जब निःश्रेयस (मोक्ष) रूप धर्मके अभिप्रायको लिया जाता है, तब यज्ञ-दैवत दोनों अर्थ, पुष्प स्थानमें गिने जाते हैं, क्योंकि—दैवतके भीतर ही याज्ञ भी आ जाता है, जिसमें कि— वह उसीके लिये है इसलिये अलग नहीं कहा जाता। और अध्यात्म फल है। क्योंकि—उपासक या मुमुक्षु पुरुष अपने संस्कार युक्त-ज्ञानसे सम्पूर्ण दैवत ज्ञानको आत्माके ही प्रति सम्पादन करता है, जिस प्रकारसे कि—“अधियज्ञ और अधिदैवत सब

हिन्दी निरुक्त । १५६ उच्छिन्न (लीन) होकर कार्य-कारणके अधिदेवताओंके द्वारा अध्यात्म ही बन जाता है। जिस प्रकार घटाकाश मठाकाशमें लय हो जाता है, और मठाकाश महाकाशमें, तथा जिस प्रकार पुष्प भावको त्याग करके पुष्प, फल भावके लिये हो जाता है, उसी प्रकार अधियज्ञ और अधिदैवत सब अध्यात्मभावको धारण कर लेते हैं। इससे याज्ञ और दैवत पुष्पस्थानमें हैं और अध्यात्म फलस्थानमें ॥ ४ ॥ ( खं० ५) साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः । ते अवरेभ्यः असाक्षात्कृत- धर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः । उपदेशाय ग्लायन्तः अवरे बिल्म, ग्रहणाय इमं ग्रन्थं समाम्नासिषुः, वेदं च वेदाङ्गानि च । बिल्मं, भिल्मं, भासनम्, इति वा । एतावन्तः समानकर्माणो धातवः । धातु- र्दधातेः । एतावन्ति अस्य सत्वस्य नामधेयानि । एतावताम् अर्थानामिदम् अभिधानम् । नैघण्टुकमिदम् । देवतानामप्राधान्येन इदम्,-इति । तद्यत् अन्यदैवते मन्त्रे निपतति, नैघण्टुकं तत् ॥ ५ ॥ अनुवाद । धर्मके प्रत्यक्ष देखनेवाले ऋषि हुए । उन्होंने पीछे होनेवाले तथा धर्मको साक्षात्कार न करनेवाले ऋषियोंके लिये उपदेश धर्मसे मन्त्रोंको दिया । पीछे होनेवाले ऋषियोंने उपदेशके लिये ग्लानि करते हुए बिल्मसे ग्रहणके लिये इस ( निघण्टु ) ग्रन्थको और वेद तथा वेदाङ्गोंको समाम्नान किया । बिल्म नाम छान बीन या प्रकाश का है। [ निघण्टुका लक्षण ] (जहां ) इतने धातु समान अर्थवाले हैं । 'धातु' शब्द 'डुधाञ् ' धारणपोषणयोः, धातुसे बनता है। इस द्रव्यके इतने नाम हैं, ऐसा ऐसा बताया जावे । यह [ ऐकपदिक या नैगमकाण्डका लक्षण ] जहां इतने अर्थोंका यह नाम है, और इसके अतिरिक्त यह नैघण्टुक (नाम) है, या देवता-

१६० अ० १ पा० ६ ख० ५ ।

ओंके अप्राधान्यसे, यह है, यह भी दिखाया जावे । [ यह नैगम- काण्ड ] अन्य देवताके मन्त्रमें उसीकी प्रशंसाके लिये दूसरे देवता का नाम आजावे उस नामको 'नैघण्टुक' कहते हैं । [ यह 'नैघण्टुक' शब्द आद्य प्रकरणके लिये नहीं बल्कि-शब्द विशेषोंके लिये है, जो नैगम काण्डमें बताये जावेंगे ।] ॥ ५ ॥ व्याख्या । निरुक्तकी प्रधानता । उत्पत्ति और उसका प्रयोजन । पूर्व ऋषि और अवर ऋषि । जिन्होंने अपने तपोबलसे धर्मका साक्षात्कार किया है, ऐसे साक्षात्कृतधर्मा पूर्व ऋषि हुए हैं। अर्थात् पूर्व ऋषि जो सब ऋषि- योंसे पहिले हुए थे, उन्होंने किसी पुरुषान्तरसे मन्त्रोंका श्रवण, नहीं किया था, अपितु विनाही श्रवणके तपोमात्रसे मन्त्रोंका दर्शन किया था। धर्मके साक्षात्कारसे, धर्मसे उत्पन्न होनेवाले सुखोंके साक्षात्कारसे है, कि-उन्होंने धर्मसे उत्पन्न होनेवाले फलोंका प्रत्यक्ष दर्शन किया था, इसीसे वे वेदार्थ व धर्मके सम्बन्धमें सर्व प्रकारसे सन्देहरहित थे। उन्हीं साक्षात्कृतधर्मा पूर्व ऋषियोंने अवर या उनसे पीछे होने- वाले ऋषियोंको ग्रन्थ तथा अर्थ दोनो ही रूपसे मन्त्र दिये । इन ऋषियोंको पूर्व ऋषियोंके समान बिना ही श्रवणके मन्त्रोंका दर्शन नहीं हुआ था, अपितु पूर्व ऋषियोंसे श्रवणके द्वारा ही मन्त्र प्राप्त हुए थे, इससे पूर्व ऋषियोंकी अपेक्षा इनका “श्रुतर्षि” यह विशेष नाम होता है । किन्तु उनमे भी उनसे पीछे होनेवाले पुरुषोंकी अपेक्षा इतना महत्व हुआ कि-उन्होने उपदेशमात्रसे ही अर्थ सहित मन्त्रोंका ग्रहण कर लिया, उनके लिये पूर्व ऋषियोंको उनके सम- झानेके लिये कुछ विशेष उपायोका अवलम्बन नहीं करना पड़ा और

हिन्दी निरुक्तः । १६१ न उन्होंको कुछ मन्त्रों या अर्थोंका श्रोषण करना पड़ा।। तात्पर्य यह कि-वे अन्तःकरणकी अति पवित्रताके एक बारही कथनमात्रसे ज्ञातव्य अर्थका ग्रहण तथा धारण करनेमें समर्थ हुए थे । उन श्रुतर्षि महापुरुषोंने अपनेसे पीछे होनेवाले पुरुषोंको देखा कि-ये अल्पायु और मन्दबुद्धि हैं, इससे ये हमारे समान वेद व वेदार्थको संकेतसे बताने मात्रसे नहीं समझेंगे, इसके कारण ग्लानि तथा खेदको प्राप्त होते हुए, ऋषियोंने अवरजनों पर परम अनुकम्पा करके गो आदि देवपत्नी पर्यन्त ( १७७० ) शब्दोंके संग्रह स्वरूप ग्रन्थका निर्माण किया । यही नहीं किन्तु इसके अतिरिक्त वेद और वेदाङ्गोका भी समाम्नान किया । प्रयोजन यह कि-पहिले एक ही वेद था, इसलिये वह अतिमहान् और पढ़नेमें कठिन था । इसलिये उसकी अनेक शाखाभेदसे समाम्नान किया । भगवान् व्यासदेवने अवर पुरुषोके सुखपूर्वक ग्रहणके लिये यह महाप्रयत्न किया था। जैसे कि-ऋग्वेदकी इक्कीस ( २१ ) शाखा, यजुर्वेदकी एक सौ ( १०० ) सामवेदकी सहस्र ( १००० ) तथा अथर्ववेदकी नो ( ६ ) शाखाएं कर दीं। इसी प्रकार ऋषियोने वेदाङ्गोका भी विभाग कर दिया।। जैसे कि- व्याकरण आठ ( ८) प्रकार और निरुक्त चोदह प्रकारका करदिया । ऐसा करदेनेसे सबके छोटे छोटे रूप होगये । "शक्तिहीन तथा अल्पायु पुरुष यथाप्रयोजन सुखपूर्वक पढ़ सकेंगे", यही प्रयोजन इस प्रयत्नका था। “बिल्म” शब्द भाष्यका है, उसका निर्वचन स्वयम् करते हैं— (क) बिल्म नाम भिल्म. वेदोका भेदम या व्यासका है। (ख) भाषण २१

१६२ अ० १ पा० ५ ख० ५ । (ग) भाषण (प्रकाशन) क्योंकि-वेदाङ्गोंके ज्ञानसे वेदका अर्थ प्रकाशित होता है । उक्त व्युत्पत्तियोंके अनुसार "बिल्म" शब्द "भिद्" या "भास्" धातुसे बनता है । निघण्टुशास्त्रकी विरचना । "निघण्टु" शास्त्रकी रचना तीन भागोंमें कीगई है । १-पहिला भाग "नैघण्टुक" है। जिसमें "इस द्रव्यके इतने नाम हैं" "इतने समान अर्थ वाले धातु हैं" ऐसी ऐसी पदोंकी राशि दिखाई गई हैं । इस प्रकरणमें 'इतने इस द्रव्यके नाम हैं'इस प्रकार जो नामों- की संख्या बताई गई है, वह उसी प्रकार स्वीकार करने योग्य है। जैसे कि-"पृथिवीके इक्कीस (२१) नाम हैं" यहां इक्कीस (२१) संख्या ग्राह्य है । इसी प्रकार धातुओंमें जो संख्या बताई है वह भी उसी प्रकार ग्राह्य है। जैसे- "गति- कर्म्माण उत्तरे धातवो द्वाविंशतशतम्" 'आगेके एकसौ बाईस (१२२) गति अर्थ वाले धातु हैं' तथा "कान्तिकर्म्माण उत्तरे धातवोऽष्टादश" 'आगे अठारह, (१८) कान्ति अर्थ वाले धातु हैं' यह १८ संख्या है। इत्यादि । अर्थात् जहां उपर्युक्त दोनों बाते या और कुछ प्रसङ्ग प्राप्त विचारा जावे, वह नैघण्टुक काण्ड है । "गौः" पदसे "जहा" शब्दसे पूर्व जितने शब्द हैं, वे उक्त सज्जानसे बोले जाते हैं । २-दूसरा भाग "नैगम" या "ऐकपदिक" काण्डके नामसे बोला जाता है। इस काण्डमे "इतने अर्थोंका यह नाम है" यह अर्थ विचारा जाता है। जैसे- "आदित्य भी 'अकूपार' है" और "समुद्र भी 'अकूपार'है" ऐसे ऐसे अनवगत संस्कार "जहा" आदि निगम शब्द विचारे जाते हैं । जिनका अर्थ

हिन्दी निरुक्त । १६३ मन्त्र आदिके लक्ष्य पर निर्णय करके सस्कार स्थिर किया जाता है कि—यह किस धातु और किस प्रत्ययके योगसे बनना चाहिये। प्रसंगसे अन्य अन्य भी उपयुक्त बातें विचारी जाती हैं। जिन शब्दोंके निर्वचनसे यह प्रतीत होता है कि—इनके प्रधान या विशेष्य मन्त्रोंमें और और पद भी है, ऐसे शब्दोंके निर्वचनका जो भाग है, वह नैगम या ऐकपदिक कहा जाता है। “नैघण्टुक” शब्दका अर्थ । जो पद अन्य देवताकी प्रधानतावाले मन्त्रमें, उस देवताका विशेषण होजाता है, वह नैघण्टुक (गौण) कहलाता है। अर्थात् इस शास्त्रमें ऐसे पदोंकी “नैघण्टुक” यह संज्ञा है ॥५॥ (खं० ६) “अश्वं न त्वा वारवन्तम् ।” अश्वमिव त्वावाल- वन्तम् । ‘वाला:’ दंशवारणार्था भवन्ति । ‘दंश:’ दश्यतेः । मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः” । मृग इव .भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । “मृगः” मार्ष्टे र्गतिकर्मणः । “भीमः” बिभ्यति अस्मात् । ‘भीष्मः’अपि एतस्मादेव । “कुचरः,”-इति, चरति कर्म कुत्सितम् । अथ चेद् देवताभिधानम्-क्काऽयं न चरति, इति । “गिरिष्ठाः” गिरिस्थायी । ‘गिरिः’ पर्वतः । समु- द्गीर्णो भवति । पर्ववान् ‘पर्वतः’ । ‘पर्व’ पुनः पृणातेः । प्रीणातेर्वा । अर्द्धमासपर्व। देवान् अस्मिन्

१६४ अ० १ पा० ६ ख० ६ । प्रीणाति,-इति । तत्प्रकृति इतरत्, बन्धिसामान्यात् । मेघस्थायी । मेघोऽपि गिरिः, एतस्मादेव । तद्यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद् ‘दैवतम्’ -इत्याचक्षते । तद् उपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः । नैघण्टुकानि इह इह ॥ ६ ॥ अनुवादः । “अश्वं न०० ’ [ ऋ० सं० १, २, २२, १ ] । [पदार्थ - ] अश्वके समान बालवाले तुझको । [ व्याख्या पद निरुक्त ] ‘बाल’ जो दंशो या मच्छरोंके हटानेके अर्थ हों । [ व्याख्याकी व्याख्याके पदका निरुक्त ] ‘दंश’ शब्द ‘दंश’ दर्शने धातुसे बनता है । “मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः” [ ऋ० सं० ८, ८, ३८, २ ] [ पदार्थ-] हे इन्द्र ! तू मृगके समान भीम कुचर और गिरिष्ठा है। [ यहां ‘इन्द्र’ प्रधान और ‘मृग’ शब्द नैघण्टुक है ] [ एक पद निरुक्त-] ‘मृग’ गत्यर्थक ‘मृज्’ धातुसे होता है । ‘भीम’ जिससे प्राणी डरें । [ समान शब्दका निरुक्त- ] ‘भीष्म’ शब्द भी इसी [ ‘ञिभी’ भये ] धातुसे बनता है। [ एक पद निरुक्त-] ‘कुचर’ जो कुत्सित या बुरा कर्म करता है। और जो देवताका कथन हो,-[ तो-] कहां यह नहीं जा सकता, अर्थात् सर्वत्र जानेके सामर्थ्यसे ‘कुचर’ है । ‘गिरिष्ठाः’ गिरिमें रहनेवाला । ‘गिरि’ पर्वत । [क्योकि-] वह ऊपरको निकला हुआ होता है । [व्याख्या-पद निरुक्त-] पर्ववाला होनेसे पर्वत है । [ विग्रहपद निरुक्त-] ‘पर्व’ नाम जो पूर्ण करे, अर्थात् ( शिला ) सन्धि । अथवा तृप्ति अर्थवाले ‘प्री’ धातुसे ‘पर्व’ बनता है । [अर्थ- तत्व-] आधे मासकी सन्धि [अमावास्या या पूर्णिमा ] । [क्योंकि-] इसमें देवताओको हवियोंसे तृप्त किया जाता है । [ यह ] दूसरा

हिन्दी निरुक्त । १६५ ( पर्व ) भी उसीको प्रकृति या स्वभाववाला है। [क्योंकि-] दोनोंमें सन्धि धर्म समान है। [ पहिलेमें शिलासन्धि और दूसरेमें काल सन्धि है ] । [ देवपक्षमे ] 'गिरिष्ठा' नाम मेघमें रहनेवालेका । [ क्योंकि-] 'गिरि' नाम मेघका भी है। उसी धर्म [ ऊपरको उठा हुआ होने ] से ॥ विशेष-दूसरे उदाहरणमें उपमान मृग या सिंह और उपमेय इन्द्र दोनोंके भीम, कुचर, और गिरिष्ठा, तोनों विशेषण हैं । 'भीम' का दोनों पक्षोंमें समान अर्थ है और अन्य दोनोंका अलग अलग जैसा कि अनुवादमे दिया गया है। अनुवाद । [ मन्त्रोंमें ] प्रधानतासे जिन देवताओकी स्तुति होती है, उनके सब नामोको 'दैवत' [ काण्ड ] कहते हैं। उसकी व्याख्या पीछे करेगे । यहां नैघण्टुक शब्दो ( गौण शब्दो ) की व्याख्या होगी । दूसरा 'इह' शब्द अध्यायकी समाप्तिके सूचनके लिये है, अथवा एक 'इह' शब्द 'गौः' आदि नैघण्टुक काण्डके अभिप्रायसे और दूसरा नैगम काण्ड जो 'जहा' आदि शब्दोंका समूह रूप हैं, उसके लिये है । व्याख्या । [ उदाहरण ] अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः । साम्राजन्तमध्वराणाम् । [ ऋ० सं० १, २, २३, १ ] शुनःशेपस्य आर्षं, गायत्री, वारवन्तीयानुशासने विनियुक्ता । साम्नश्च वारवन्तीयस्य एषः योनिः । हे अग्ने ! जैसे बालवाले घोड़ेकी परिचर्या या सेवा की

३६६ अ० १ पा० ६ ख० ६ । जाती है, वैसे ही हम तुम तेजवाले और अध्वरों या यज्ञोंके सम्राट्‌को नमस्कारोंसे वन्दना करते हैं। इस ऋचामें 'अश्व' शब्द नैघण्टुक या गौण है और 'अग्नि' प्रधान, यह इसके अर्थसे ही प्रतीत होता है । उदाहरणके शब्दोंकी व्याख्या । 'अश्वं, न' अश्वमिव । अश्वके समान । 'वारवन्तम्' वालवन्तम् । बालवालेको । व्याख्या प्रसक्तकी व्याख्या— 'वालाः' दंशवारणार्था भवन्ति । मच्छरोंके वारण करनेवाले । व्याख्याकी व्याख्यामें आये हुएकी व्याख्या । 'दंशः' दशतेः । काटनेवाला या डसनेवाला । ( २ )—"मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आजगन्था परस्याः । सृकं संशाय पविमिंद्र तिग्मं विशत्रून् ताळ्हि विमृधो नुदस्व ॥” (ऋ० सं० ८. ८, ३८, २) गयो नामेन्द्रपुत्रः, तस्येयमर्षम् । विष्टुप् । व- मृधस्य द्विविधो योज्या । । इस ऋचामें इन्द्र प्रधान है, और “मृग” नैघण्टुक (गौण) । हे इन्द्र ! तू दूर द्युलोकसे हमारे इस कर्ममें आ। और अपने वज्रको तीखा करके पर्वतचारी अन्य प्राणियोंको संहार करनेवाले भयानक सिंहके समान हमारे शत्रुओंको मार, तथा जिनको न मारना चाहे, उनको दूर ले जा, जिसमें कि—वे फिर न आवें । उदाहरण ऋचाके शब्दोंकी व्याख्या । “मृगः” सिंह अथवा व्याघ्र । गत्यर्थक ‘मृज्’ धातुसे बनता है ।

हिन्दी निरुक्त । १६७ “न” इव । समान । “भीमः” विभ्यति अस्मात् । जिससे अन्य प्राणी या शत्रु डरें 'ञिभी' भये धातुसे बनता है । “भीष्मः” यह शब्द मन्त्र और उसकी व्याख्यामें नहीं है, किन्तु 'भीम' शब्दके सादृश्यसे आया है । वही धातु और वही अर्थ है । “कुचरः” (१) 'चरति कर्म कुत्सितम्' निन्दित कर्मका करनेवाला । (२) देवताके पक्षमें 'क्वायं न चरति' कहां नहीं जा सकता ? अर्थात् सब स्थानोमें विचरनेवाला । “गिरिष्ठाः” 'गिरिस्थायी' पर्वतमें रहनेवाला । “गिरिः” 'पर्वतः' पहाड़ । क्योंकि—वह पृथ्वीसे उगला हुआ रहता है । “पर्वतः” 'पर्ववान् भवति' क्योंकि—उसमें शिला शिखरों- की सन्धियां रूप पर्व रहते हैं । “पर्व” (१) 'पृणाति पर्वतम्' 'पृ' धातु (पूरणार्थक) से बनता है । क्योंकि—शिलाओंके शिखरोंकी सन्धियां पर्वतको पूर्ण या व्याप्त कर देती हैं (२) अथवा प्रीञ् तर्पणे धातुसे बनता है, पूर्णिमा या अमावस्याका नाम है। क्योंकि—इनमें देवताओंकी तृप्ति की जाती है। जिस प्रकार 'पर्व' शब्दका शिलासन्धिके अतिरिक्त अह्न मास सन्धि या पक्ष सन्धि अर्थ हो जाता है, वैसे ही 'गिरिष्ठा' शब्द- का भी 'पर्वस्थायी' अर्थके अतिरिक्त 'मेघस्थायी' भी होता है, क्योंकि—मेघ भी अन्तरिक्ष या आकाशमें उगला हुआ होता है, इससे

१६८ अ० १ पा० ६ ख० ६ । वह 'गिरि' शब्दका वाच्य होता है। यह अर्थ देवपक्षमे लिया जाता है अर्थात् पर्वतमें सिंह और मेघमें इन्द्र रहता है, इसलिये यह विशेषण दोनों पक्षोंमे उपयुक्त होता है। उपसंहार । निरुक्त शास्त्र उक्त रीति के अनुसार तीन प्रकरणोंमें विभक्त है। नैघण्टुक, नैगम, और दैवत। मन्त्रोंमें सर्वत्र ही दैवता पद मुख्य या विशेष्य होता है, क्योंकि-उनमें देवताओंकी स्तुति ही होती है, इसलिये देवता पदोंके अतिरिक्त सब पद देवताकी प्रशंसाके लिये होते हैं, इससे वह सब विशेषण होते हैं, मन्त्रोंमें प्रधानतासे जिनकी स्तुति की जाती है वे देवता है, उनके नाम जो 'अग्नि' आदि 'देवपत्नी' पर्यन्त १५१ शब्द है, एक स्थानमे संग्रह किये हुए हैं, वे ही मन्त्रोंमे विशेष्य पदके रूपमे आते है। ये ही समुदित शब्द 'दैवत' इस रूढ संज्ञासे बोले जाते हैं। इनकी व्याख्या शास्त्रके अन्त या पिछले भागमें की जावेगी, क्योकि-विशेषण शब्दोंके अर्थ- ज्ञानके पश्चात् उनके अर्थ के जाननेमे सुभीता रहेगा, इसके अति- रिक्त यह भी है कि-"निघण्टु" ग्रन्थमें कुल १७७० शब्द है, उनमें १५१ शब्द देवताओंके वाचक या विशेष्य है, शेष १६१६ शब्द विशे- षण हैं, इस रीतिसे विशेषण शब्दोका संख्या अधिक होने पर भी व्याख्या अल्प और सुगम है, एवम् दैवत शब्दोकी संख्या अत्यल्प होनेपर भी व्याख्या अधिक और गम्भीर तथा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है, इस बुद्धि गौरवके कारण ही दैवत काण्डकी व्याख्या अन्तमें ही की जायगी। यहां पर पहिले नैघण्टुक तथा नैगम प्रकरणमें विशेषण शब्दोकी व्याख्या की जायगो। आचार्यने इस बात पर बड़ा ही ध्यान रखकर निरुक्तशास्त्रकी रचना की है, कि-मनुष्योंको इस शास्त्रके द्वारा देवता तत्त्वका,

हिन्दी निरुक्त । १६६ परिज्ञान तथा उससे मिलनेवाले फलका लाभ किस प्रकार सुख- पूर्वक हो ? 'गोः' पदसे आरम्भ करके "देवपत्न्यो" पर्यन्त जो कुल शब्द इस शास्त्रमें हैं, उन सबका "निघण्टु" नाम है, उसके एक भागको “नैघण्टुक” कहते हैं, जिसमें “गोः” पदसे आरम्भ कर 'जहा” शब्दसे पूर्व पूर्व परिगणित शब्द आये हैं । इस शास्त्रकी लोक व्यवहारसे "निघण्टु" सञ्ज्ञा, और उसके उपर्युक्त भागके प्रथम अध्यायमे तृतीय अध्याय पर्यन्त ग्रन्थके रूपमें है, भाष्य व्यवहारसे "नैघण्टुक” संञ्ज्ञा है । "जहा" शब्दसे ( पीछे और "अग्निः” पदसे पूर्व ) पूर्व जितने शब्द हैं, वे सब मिलकर "नैगम" और ऐकपदिक इन दो संञ्ज्ञाओंसे व्यवहृत होते हैं। यह प्रकरण निघण्टु शास्त्रके चतुर्थाध्यायके रूपमें है। इन दोनों प्रकरणोंमें नैघण्टुक तथा नैगम शब्दोंकी व्याख्या होगी। षष्ठः पादः समाप्तः । प्रथमाध्यायश्च परिसमाप्तः ।

१ खण्ड सूत्र-- समाम्नायः (१) तत्र॑ चतुष्ट्वम् (२) अ॑तोऽन्ये (३) अ॑थ निपाताः (४) वा॑युर्वात्वा (५) न नूनम् (६) नूनं सा ते (७) ऋचान्त्वः (८) अ॑क्षरावन्तः (६) नि॑ष्ट्‌व- क्तासः (१०) हविर्भिः (११) इतीमानि (१२) अथा- पि यः (१३) य॑थोहि नु (१४) अथापीदम् (१५) अ॑र्थ- वन्तः (१६) अथापीदम् (१७) स्थाणुरयम् (१८) उतत्वः पश्यन् (१८) उ॑तत्वं सख्ये (२०) विंशतिः (२०) ॥ इति निरुक्ते पूर्वषट्के प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ १—“गौरश्वः ०—० औदुम्बरायणः” इतना भाग १ खण्डका इसमें सम्मिलित है, तथा इसी खण्डका भाग “षड्भाव विकाराः” तीसरा खण्ड है। २—इसका एक भाग “आ इत्यार्वागर्थे” यह ५वां खण्ड किया हुआ है। ( १मः पादः) ३—“चिदित्येषः” २रा और “वृक्षस्यनु” ३रा खण्ड इसीके अंश हैं। ४—यह “वृक्षस्यनु” इस खण्डके अन्तमें सन्निविष्ट है। और “अह इतिच” यह इसीका भाग है। (द्वितीयः पा० ) ५—इसका अन्तिम भाग “पर्याया इव ०—० कमोमिद्विति” अगले खण्ड निष्ट्‌वक्तासः” के आदिमें है। ६—इसका अन्तिम भाग “सुविदुरिव ०—० परिभये” अगले “हविर्भिः” खण्डके आदिमें संयुक्त है। ( ३यः पादः) ७—इसीका भाग “अथाप्येवम्” पद खण्ड है। (४र्थः पादः) ८—यह पूर्व खण्डके अन्तमें संयुक्त है, इसीका शेष मीलन्तौ यह पर खण्ड है। ( ५मः पादः) ६—इसीके भाग—“साक्षात्कृतधर्माणः” और “अश्वं न त्वा” ये खण्ड हैं।

हिन्दी-निरुक्त । द्वितीयाध्यायस्य-- प्रथम-पादः । ( खं० १ ) ॐ । अथ निर्वचनम् । तद् येषु पदेषु स्वर संस्कारौ समर्थौ प्रादेशिकेन गुणेन अन्वितौ स्यातां, तथा तानि निर्ब्रूयात् । अथ अनन्विते अर्थे, अप्रादेशिके विकारे अर्थं नित्यः परीक्षेत, केन- चिद्वृत्ति सामान्येन । अविद्यमाने सामान्येऽपि अक्षरवर्ण सामान्याद् निर्ब्रूयाद्, नत्वेव न निर्ब्रू- याद्, न संस्कार माद्रियेत । विषयवत्यो हिवृत्तयो भवन्ति । यथार्थं विभक्तीः, सं नमयेत् । 'अत्तम्' 'अवत्तम्'-इति धात्वाद्येव शिष्यते ॥ १ ॥ अर्थ—[क्योंकि—निर्वचनके लक्षणके बिना शब्दोंकी व्याख्या नहीं हो सकती,] इसीसे निर्वचनका [लक्षण कहते हैं।] [जिस व्युत्पत्ति या व्याख्याके द्वारा शब्दका अर्थ, उसके भागों (प्रकृते- प्रत्यय आदिकों) से प्रतीत हो जावे, उस व्याख्याको 'निर्वचन' कहते हैं।] वह [इस प्रकार होना चाहिए-] जिन पदोंमें स्वर।

२ २ अ० १ पा० १ खं० । और संस्कार समर्थ या समान अर्थमें हों, और प्रादेशिक या क्रिया-वाचक धातुसे संयुक्त हों, वहां उन्हें उसी प्रकार निर्वचन करे। यदि और ही प्रकारका अर्थ हो, और और ही प्रकारका शब्द हो, तो अर्थ प्रधान होकर, किसी क्रिया या गुणकी समानता को लेकर, शब्दकी व्याख्या या निर्वचन करे। यदि वैसी भी समानता न पावे, तो अक्षर या वर्णका सादृश्य लेकर ही निर्वचन करे। किन्तु 'न निर्वचन करे और न संस्कारका आदर करे'— ऐसा न हो। क्योंकि—शब्दकी वृत्तियां संशय युक्त होती हैं। [इसी प्रकार] विभक्तियोंका अर्थके अनुसार विपरिणाम करना। 'प्रत्तम्' 'अवत्तम्' यहां पर धातुके आदि अक्षर ही शेष रहते हैं ॥१॥ व्याख्या “अथ निर्वचनम्” । नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातका लक्षण कहकर, शास्त्रके अप्रयोजन, प्रयोजन-सहित वेद तथा वेदाङ्गोंके भेद, तीन प्रकरणोंके विभागसे, निघण्टु समाम्नायकी रचना बताकर, दैवत-काण्डको अवशेष रखकर, नैघण्टुक तथा नैगम दोनों काण्डोंको साम्हने रख कर कहा है कि—इनमें नैघण्टुक और नैगम शब्द कहे जायेंगे। किन्तु निर्वचनके लक्षणके बताये बिना उनकी व्याख्या नहीं हो सकती। इस कारण पहिले निर्वचनका लक्षण या उन शब्दोंकी व्याख्या करनेके नियम कहते हैं। यह निर्वचन—परोक्षवृत्ति और अतिपरोक्षवृत्ति शब्दोंमें धातु-प्रत्यय आदिके विभाग दिखाकर, उनके अर्थको कहना ही, निर्वचन है। यहां दो प्रकारके शब्द हैं, समर्थ-स्वर-संस्कार और असमर्थ- स्वर-संस्कार। १—इनमें जो प्रथम 'समर्थ-स्वर-संस्कार' शब्द हैं, जिनमें कि— स्वर (उदात्त, आदि) और संस्कार (प्रत्यय, आदि) क्रिया-

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वाचक, धातुसे संयुक्त हों, अर्थात्—व्याकरण शास्त्रकी रीति- से उन शब्दोंमें जैसा प्रकृति और प्रत्यय विभाग, बताया है, वह सब उन शब्दोंके स्वर तथा अर्थ के अनुकूल हों, किन्तु कोई विरोध न करता हो, तो वहां व्याकरणकी रीतिसे ही उन शब्दोंका व्याख्यान या निर्वचन करना। वहां निरुक्तके लक्षणके अनुसार व्याख्या करनेका प्रयोजन नहीं है। २—जिन शब्दोंमें व्याकरण-शास्त्रकी विधिसे बहुत निपुणतापूर्वक देखनेसे भी स्वर-संस्कार, सहित धातुके द्वारा शब्द वा अर्थ- की कल्पना नहीं की जा सकती है; अर्थात्—व्याकरणकी रीति पर जो कुछ किया जाता है, उससे वहांकें शब्द व अर्थ- की सिद्धि न होकर और ही शब्द या अर्थ बनता दिखाई दे, वहां व्याकरणके अवलम्बको छोड़कर अर्थ-नित्य या अर्थ प्रधान होकर शब्दोंकी परीक्षा करे। प्रयोजन यह है कि— उस नामको देखकर उसमें किसी धातु या अर्थ का कुछ सादृश्य (सामान्य) दिखाई दे, कि—इस धातु या क्रियाका इसमें कोई सम्बन्ध है, उसीसे उसका निर्वचन कर लेना, क्योंकि—अर्थ प्रधान और शब्द, गुणभूत या गौण हैं। इसीसे शब्द सादृश्यकी अपेक्षा अर्थ का सादृश्य अधिक बलवान् होता है। ३—जहां एक शब्दके साथ दूसरे शब्दका अर्थ सादृश्य भी नहीं है, वहां पर अर्थकी समानता न रहने पर भी, स्वर या व्यञ्जन- के सादृश्यको लेकर ही निर्वचन करे, किन्तु ऐसी अवस्थामें भी, व्याकरणोक्त संस्कारोंका आदर न करके, शब्दके निर्व- चनकी टाल न करे। इस प्रकार अर्थ के सामान्य रूपके न होने पर भी स्वर अथवा वर्णके सामान्य मात्रसे भी निर्वचन अवश्य ही करे, ऐसा बिल्कुल

४ २ अ० १ पा० १ खं० । न हो कि—निर्वचन न करे; क्योंकि—ऐसा न होने पर निरुक्त- शास्त्र अनर्थक ही रहेगा; किन्तु ऐसा न हो! इसीसे यह कहा है, कि—“जिन शब्दोंमें व्याकरणके नियम (सूत्र) नहीं घटते हों, उनमें उनका आदर न करे”। तो फिर क्या करे? अर्थ-सामान्य या शब्द सामान्यको लेवे। जैसे कि—‘प्रवीण’ ‘उदार’ और ‘निख्रिंस’ शब्द, अपने अभिधेय (स्वभाव प्राप्य) अर्थके सम्बन्धको छोड़कर, क्रियाके सामान्य रूप हेतुको ही लेकर अन्य ही अर्थोंमें रहते हैं। यथा—“प्रकृष्टो वीणायां प्रवीणो गान्धर्वे”— ‘प्र’ और ‘वीणा’ इन दो शब्दोंसे ‘प्रवीण’ शब्द बना है। जिस- का मुख्य अर्थ यह हो सकता है कि—वीणाके बजानेमें बहुत अभ्यासी है; अथवा गन्धर्व शास्त्रमें बड़ा चतुर या योग्यतावान् है। किन्तु यह शब्द अपने गन्धर्व-पाटव-रूप मुख्य अर्थ को छोड़ कर, केवल अभ्यासके पाटव या चतुराईको लेकर सभी जगह प्रवृत्त हो गया है। अर्थात् ‘जो पुरुष जिस कर्ममें कुशल है, वही ‘प्रवीण’ शब्दसे बोला जाता है’। जैसे ‘प्रवीणो व्याकरणे’ व्याकरणमें प्रवीण है। ‘प्रवीणो निरुक्ते’ निरुक्तमें प्रवीण है। तात्पर्य यह है कि—इस शब्दने अपने मुख्य अर्थमेंसे गांधर्व- विद्याके सम्बन्धको छोड़ दिया है, और वे भाग अर्थात् अभ्यास- पाटव, जो अन्य अन्य स्थानोंमें भी है, ले लिया है। जो अर्थ का भाग अनेक स्थानोंमें मिलता है, उसीको अर्थ का सामान्य या साधारण भाग कहते हैं, अर्थ सामान्यसे निर्वचनके स्थानमें इस बात पर ध्यान रखना चाहिये। ऐसे ही ‘उदार’ शब्द है, यह शब्द ‘उद्’ और ‘आर’ शब्दसे बना है। उद्‌का अर्थ ‘उद्‌गत’ है, चला गया या दूर हो गया, अथवा उड़ गया। ‘आर’ नाम उस लोहेके काँटे १ है, जिसे गाड़ी-

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वान् लोग घोड़े या बैलके चुभानेके लिये किसी पतली लाठीमें लगाये रखते हैं। जो घोड़ा या बैल अपने ऊपर आरके आनेसे पहिले ही गाड़ी- वान्के अभिप्रायको जानकर पहिले ही चल पड़ता है, वो 'उद्ग- तार', अर्थात् जिससे सदा ही आर दूर रहता है, उस घोड़े या बैलमें, इस शब्दकी उचित वृत्ति है, किन्तु यह अपने उस उचित अर्थ को छोड़कर केवल 'अभिप्रायके अनुसार करने' को निमित्त बनाकर ही सर्वत्र प्रवृत्त हो जाता है। जो कोई किसीको, — उसके अभिप्रायको — जानकर ही, उसके मांगनेसे पहिले ही, दे देता है, वह 'उदार' नामसे बोला जाता है। ऐसे ही 'निस्त्रिंश' शब्द है। 'निः' 'त्रि' और 'शो' (शा) धातु इन तीन शब्दोंके मेलनसे 'निस्त्रिंश' शब्द बना है। तीन प्रदेशों अर्थात् दो धार और एक अग्रसे निशित या पैन' (तीक्ष्ण) होकर छेदन करता है, वह 'निस्त्रिंश' कहलाता है। अर्थात् खड्ग। क्योंकि वहीं इस शब्दकी मुख्य अर्थके ग्रहणसे समझस वृत्ति होती है, किन्तु यह शब्द छेदनरूप क्रूरता सामान्यको लेकर सब जगह प्रवृत्त है। जो ही लोकमें क्रूर होता है, वही 'निस्त्रिंश' नामसे बोला जाता है। इस रीतिसे ये शब्द क्रिया-रूप गुणके सामान्य मात्रको लेकर अन्यत्र अन्यत्र अर्थोंमें रहते हैं। जैसे कि—ये हैं, ऐसे ही और शब्दोंमें भी ऊहा या कल्पना करना। और कल्पना करके अर्थ सामान्यसे निर्वचन करना। स्वर और वर्ण सामान्यके बहुत उदाहरण हैं, अर्थात् जितने नैगम शब्द शब्दीय, काण्डमें आवेंगे सब स्वर-वर्ण सामान्यमात्रसे ही निर्वचन किये जाते हैं। निरुक्तमें कारक, हारक, लावक, — आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति नहीं की जाती, क्योंकि—उनकी व्युत्पत्ति सीधी और व्याकरणमें प्रसिद्ध

६ २ अ० १ पा० १ खं० । है। अर्थात् जो शब्द दुर्बोध्य या परोक्षवृत्ति तथा अपरोक्षवृत्ति हैं, जैसे—बिल्म, कुदरं, उदार, चैतस, पव आदि शब्द हैं वेही व्युत्प- तिके साथ निर्वचन किये जाते हैं। उन्हीं शब्दोंमें निरुक्तकी विशे- षरूपसे सार्थकता है। उन्हींको अर्थ सामान्यसे या शब्द सामा- न्यसे निर्वचन करे। उनमैं व्याकरणोक्त संस्कारका आदर न करे। व्याकरणके अनादरका मुख्य कारण यह है कि—परोक्षवृत्ति शब्द जो 'असमर्थ स्वर संस्कार' नामसे विभाग किये जा चुके हैं, उनकी व्याकरणके अनुसार चलने या न चलने पर, भी किसो अर्थमें वृत्ति नहीं टिकती, अपितु नानाभावसे अनेक अर्थोंमें जाती है, नहीं निश्चय होता किं—“ऐसे होगा ? या ऐसे होगा ?” विचार करते हुए मनुष्य विरुद्धपक्षसे मोहको प्राप्त होजाते हैं। जब कि—इनकी वृत्ति उक्त प्रकारसे अवस्थित नहीं होती, तो व्याकरणके पीछे लगे ही रहनेसे क्या होगा ? इससे व्याकरण पर नितराम् निर्भर नहीं रहना होगा । शब्दोंकी वृत्तियोंके भेद । (१) कोई शब्द अर्थके सादृश्यसे कहीं, (२) कोई स्वरके सादृश्य से कहीं, (३) और कोई वर्णके सादृश्यसे कहीं, रहते हैं। इसी प्रकारसे विभक्तियोंका भी पूर्व-पर प्रकरणोंके अविरोध पूर्वक अर्थके अनुसार परिवर्त्तन होता है। क्योंकि—उनका भी व्यत्यय या विप- रीतभाव देखा जाता है। जैसे कि—वैयाकरणोंने कहा है— “सुपांस्थाने सुपोभवन्ति”— इसका तात्पर्यार्थ यह है कि—चाहे जिस विभक्तिके स्थानमें चाहे जो विभक्ति होजाती है। जैसा कि—आचार्य (दै० कां० ६, ३, १२ ) दिखावेंगे भी-‘हृत्सुशोकैः” ७-१‘हृदयानिशोकैः’ इत्यादि। अर्थात् यहां द्वितीयाके एक वचनके बदलेमें, उसका बहु वचन लिया जाता है।