निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१ खण्ड सूत्र-- समाम्नायः (१) तत्र॑ चतुष्ट्वम् (२) अ॑तोऽन्ये (३) अ॑थ निपाताः (४) वा॑युर्वात्वा (५) न नूनम् (६) नूनं सा ते (७) ऋचान्त्वः (८) अ॑क्षरावन्तः (६) नि॑ष्ट्व- क्तासः (१०) हविर्भिः (११) इतीमानि (१२) अथा- पि यः (१३) य॑थोहि नु (१४) अथापीदम् (१५) अ॑र्थ- वन्तः (१६) अथापीदम् (१७) स्थाणुरयम् (१८) उतत्वः पश्यन् (१८) उ॑तत्वं सख्ये (२०) विंशतिः (२०) ॥ इति निरुक्ते पूर्वषट्के प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ १—“गौरश्वः ०—० औदुम्बरायणः” इतना भाग १ खण्डका इसमें सम्मिलित है, तथा इसी खण्डका भाग “षड्भाव विकाराः” तीसरा खण्ड है। २—इसका एक भाग “आ इत्यार्वागर्थे” यह ५वां खण्ड किया हुआ है। ( १मः पादः) ३—“चिदित्येषः” २रा और “वृक्षस्यनु” ३रा खण्ड इसीके अंश हैं। ४—यह “वृक्षस्यनु” इस खण्डके अन्तमें सन्निविष्ट है। और “अह इतिच” यह इसीका भाग है। (द्वितीयः पा० ) ५—इसका अन्तिम भाग “पर्याया इव ०—० कमोमिद्विति” अगले खण्ड निष्ट्वक्तासः” के आदिमें है। ६—इसका अन्तिम भाग “सुविदुरिव ०—० परिभये” अगले “हविर्भिः” खण्डके आदिमें संयुक्त है। ( ३यः पादः) ७—इसीका भाग “अथाप्येवम्” पद खण्ड है। (४र्थः पादः) ८—यह पूर्व खण्डके अन्तमें संयुक्त है, इसीका शेष मीलन्तौ यह पर खण्ड है। ( ५मः पादः) ६—इसीके भाग—“साक्षात्कृतधर्माणः” और “अश्वं न त्वा” ये खण्ड हैं।