निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी-निरुक्त । द्वितीयाध्यायस्य-- प्रथम-पादः । ( खं० १ ) ॐ । अथ निर्वचनम् । तद् येषु पदेषु स्वर संस्कारौ समर्थौ प्रादेशिकेन गुणेन अन्वितौ स्यातां, तथा तानि निर्ब्रूयात् । अथ अनन्विते अर्थे, अप्रादेशिके विकारे अर्थं नित्यः परीक्षेत, केन- चिद्वृत्ति सामान्येन । अविद्यमाने सामान्येऽपि अक्षरवर्ण सामान्याद् निर्ब्रूयाद्, नत्वेव न निर्ब्रू- याद्, न संस्कार माद्रियेत । विषयवत्यो हिवृत्तयो भवन्ति । यथार्थं विभक्तीः, सं नमयेत् । 'अत्तम्' 'अवत्तम्'-इति धात्वाद्येव शिष्यते ॥ १ ॥ अर्थ—[क्योंकि—निर्वचनके लक्षणके बिना शब्दोंकी व्याख्या नहीं हो सकती,] इसीसे निर्वचनका [लक्षण कहते हैं।] [जिस व्युत्पत्ति या व्याख्याके द्वारा शब्दका अर्थ, उसके भागों (प्रकृते- प्रत्यय आदिकों) से प्रतीत हो जावे, उस व्याख्याको 'निर्वचन' कहते हैं।] वह [इस प्रकार होना चाहिए-] जिन पदोंमें स्वर।