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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी-निरुक्त । द्वितीयाध्यायस्य-- प्रथम-पादः । ( खं० १ ) ॐ । अथ निर्वचनम् । तद् येषु पदेषु स्वर संस्कारौ समर्थौ प्रादेशिकेन गुणेन अन्वितौ स्यातां, तथा तानि निर्ब्रूयात् । अथ अनन्विते अर्थे, अप्रादेशिके विकारे अर्थं नित्यः परीक्षेत, केन- चिद्वृत्ति सामान्येन । अविद्यमाने सामान्येऽपि अक्षरवर्ण सामान्याद् निर्ब्रूयाद्, नत्वेव न निर्ब्रू- याद्, न संस्कार माद्रियेत । विषयवत्यो हिवृत्तयो भवन्ति । यथार्थं विभक्तीः, सं नमयेत् । 'अत्तम्' 'अवत्तम्'-इति धात्वाद्येव शिष्यते ॥ १ ॥ अर्थ—[क्योंकि—निर्वचनके लक्षणके बिना शब्दोंकी व्याख्या नहीं हो सकती,] इसीसे निर्वचनका [लक्षण कहते हैं।] [जिस व्युत्पत्ति या व्याख्याके द्वारा शब्दका अर्थ, उसके भागों (प्रकृते- प्रत्यय आदिकों) से प्रतीत हो जावे, उस व्याख्याको 'निर्वचन' कहते हैं।] वह [इस प्रकार होना चाहिए-] जिन पदोंमें स्वर।

२ २ अ० १ पा० १ खं० । और संस्कार समर्थ या समान अर्थमें हों, और प्रादेशिक या क्रिया-वाचक धातुसे संयुक्त हों, वहां उन्हें उसी प्रकार निर्वचन करे। यदि और ही प्रकारका अर्थ हो, और और ही प्रकारका शब्द हो, तो अर्थ प्रधान होकर, किसी क्रिया या गुणकी समानता को लेकर, शब्दकी व्याख्या या निर्वचन करे। यदि वैसी भी समानता न पावे, तो अक्षर या वर्णका सादृश्य लेकर ही निर्वचन करे। किन्तु 'न निर्वचन करे और न संस्कारका आदर करे'— ऐसा न हो। क्योंकि—शब्दकी वृत्तियां संशय युक्त होती हैं। [इसी प्रकार] विभक्तियोंका अर्थके अनुसार विपरिणाम करना। 'प्रत्तम्' 'अवत्तम्' यहां पर धातुके आदि अक्षर ही शेष रहते हैं ॥१॥ व्याख्या “अथ निर्वचनम्” । नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातका लक्षण कहकर, शास्त्रके अप्रयोजन, प्रयोजन-सहित वेद तथा वेदाङ्गोंके भेद, तीन प्रकरणोंके विभागसे, निघण्टु समाम्नायकी रचना बताकर, दैवत-काण्डको अवशेष रखकर, नैघण्टुक तथा नैगम दोनों काण्डोंको साम्हने रख कर कहा है कि—इनमें नैघण्टुक और नैगम शब्द कहे जायेंगे। किन्तु निर्वचनके लक्षणके बताये बिना उनकी व्याख्या नहीं हो सकती। इस कारण पहिले निर्वचनका लक्षण या उन शब्दोंकी व्याख्या करनेके नियम कहते हैं। यह निर्वचन—परोक्षवृत्ति और अतिपरोक्षवृत्ति शब्दोंमें धातु-प्रत्यय आदिके विभाग दिखाकर, उनके अर्थको कहना ही, निर्वचन है। यहां दो प्रकारके शब्द हैं, समर्थ-स्वर-संस्कार और असमर्थ- स्वर-संस्कार। १—इनमें जो प्रथम 'समर्थ-स्वर-संस्कार' शब्द हैं, जिनमें कि— स्वर (उदात्त, आदि) और संस्कार (प्रत्यय, आदि) क्रिया-

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वाचक, धातुसे संयुक्त हों, अर्थात्—व्याकरण शास्त्रकी रीति- से उन शब्दोंमें जैसा प्रकृति और प्रत्यय विभाग, बताया है, वह सब उन शब्दोंके स्वर तथा अर्थ के अनुकूल हों, किन्तु कोई विरोध न करता हो, तो वहां व्याकरणकी रीतिसे ही उन शब्दोंका व्याख्यान या निर्वचन करना। वहां निरुक्तके लक्षणके अनुसार व्याख्या करनेका प्रयोजन नहीं है। २—जिन शब्दोंमें व्याकरण-शास्त्रकी विधिसे बहुत निपुणतापूर्वक देखनेसे भी स्वर-संस्कार, सहित धातुके द्वारा शब्द वा अर्थ- की कल्पना नहीं की जा सकती है; अर्थात्—व्याकरणकी रीति पर जो कुछ किया जाता है, उससे वहांकें शब्द व अर्थ- की सिद्धि न होकर और ही शब्द या अर्थ बनता दिखाई दे, वहां व्याकरणके अवलम्बको छोड़कर अर्थ-नित्य या अर्थ प्रधान होकर शब्दोंकी परीक्षा करे। प्रयोजन यह है कि— उस नामको देखकर उसमें किसी धातु या अर्थ का कुछ सादृश्य (सामान्य) दिखाई दे, कि—इस धातु या क्रियाका इसमें कोई सम्बन्ध है, उसीसे उसका निर्वचन कर लेना, क्योंकि—अर्थ प्रधान और शब्द, गुणभूत या गौण हैं। इसीसे शब्द सादृश्यकी अपेक्षा अर्थ का सादृश्य अधिक बलवान् होता है। ३—जहां एक शब्दके साथ दूसरे शब्दका अर्थ सादृश्य भी नहीं है, वहां पर अर्थकी समानता न रहने पर भी, स्वर या व्यञ्जन- के सादृश्यको लेकर ही निर्वचन करे, किन्तु ऐसी अवस्थामें भी, व्याकरणोक्त संस्कारोंका आदर न करके, शब्दके निर्व- चनकी टाल न करे। इस प्रकार अर्थ के सामान्य रूपके न होने पर भी स्वर अथवा वर्णके सामान्य मात्रसे भी निर्वचन अवश्य ही करे, ऐसा बिल्कुल

४ २ अ० १ पा० १ खं० । न हो कि—निर्वचन न करे; क्योंकि—ऐसा न होने पर निरुक्त- शास्त्र अनर्थक ही रहेगा; किन्तु ऐसा न हो! इसीसे यह कहा है, कि—“जिन शब्दोंमें व्याकरणके नियम (सूत्र) नहीं घटते हों, उनमें उनका आदर न करे”। तो फिर क्या करे? अर्थ-सामान्य या शब्द सामान्यको लेवे। जैसे कि—‘प्रवीण’ ‘उदार’ और ‘निख्रिंस’ शब्द, अपने अभिधेय (स्वभाव प्राप्य) अर्थके सम्बन्धको छोड़कर, क्रियाके सामान्य रूप हेतुको ही लेकर अन्य ही अर्थोंमें रहते हैं। यथा—“प्रकृष्टो वीणायां प्रवीणो गान्धर्वे”— ‘प्र’ और ‘वीणा’ इन दो शब्दोंसे ‘प्रवीण’ शब्द बना है। जिस- का मुख्य अर्थ यह हो सकता है कि—वीणाके बजानेमें बहुत अभ्यासी है; अथवा गन्धर्व शास्त्रमें बड़ा चतुर या योग्यतावान् है। किन्तु यह शब्द अपने गन्धर्व-पाटव-रूप मुख्य अर्थ को छोड़ कर, केवल अभ्यासके पाटव या चतुराईको लेकर सभी जगह प्रवृत्त हो गया है। अर्थात् ‘जो पुरुष जिस कर्ममें कुशल है, वही ‘प्रवीण’ शब्दसे बोला जाता है’। जैसे ‘प्रवीणो व्याकरणे’ व्याकरणमें प्रवीण है। ‘प्रवीणो निरुक्ते’ निरुक्तमें प्रवीण है। तात्पर्य यह है कि—इस शब्दने अपने मुख्य अर्थमेंसे गांधर्व- विद्याके सम्बन्धको छोड़ दिया है, और वे भाग अर्थात् अभ्यास- पाटव, जो अन्य अन्य स्थानोंमें भी है, ले लिया है। जो अर्थ का भाग अनेक स्थानोंमें मिलता है, उसीको अर्थ का सामान्य या साधारण भाग कहते हैं, अर्थ सामान्यसे निर्वचनके स्थानमें इस बात पर ध्यान रखना चाहिये। ऐसे ही ‘उदार’ शब्द है, यह शब्द ‘उद्’ और ‘आर’ शब्दसे बना है। उद्‌का अर्थ ‘उद्‌गत’ है, चला गया या दूर हो गया, अथवा उड़ गया। ‘आर’ नाम उस लोहेके काँटे १ है, जिसे गाड़ी-

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वान् लोग घोड़े या बैलके चुभानेके लिये किसी पतली लाठीमें लगाये रखते हैं। जो घोड़ा या बैल अपने ऊपर आरके आनेसे पहिले ही गाड़ी- वान्के अभिप्रायको जानकर पहिले ही चल पड़ता है, वो 'उद्ग- तार', अर्थात् जिससे सदा ही आर दूर रहता है, उस घोड़े या बैलमें, इस शब्दकी उचित वृत्ति है, किन्तु यह अपने उस उचित अर्थ को छोड़कर केवल 'अभिप्रायके अनुसार करने' को निमित्त बनाकर ही सर्वत्र प्रवृत्त हो जाता है। जो कोई किसीको, — उसके अभिप्रायको — जानकर ही, उसके मांगनेसे पहिले ही, दे देता है, वह 'उदार' नामसे बोला जाता है। ऐसे ही 'निस्त्रिंश' शब्द है। 'निः' 'त्रि' और 'शो' (शा) धातु इन तीन शब्दोंके मेलनसे 'निस्त्रिंश' शब्द बना है। तीन प्रदेशों अर्थात् दो धार और एक अग्रसे निशित या पैन' (तीक्ष्ण) होकर छेदन करता है, वह 'निस्त्रिंश' कहलाता है। अर्थात् खड्ग। क्योंकि वहीं इस शब्दकी मुख्य अर्थके ग्रहणसे समझस वृत्ति होती है, किन्तु यह शब्द छेदनरूप क्रूरता सामान्यको लेकर सब जगह प्रवृत्त है। जो ही लोकमें क्रूर होता है, वही 'निस्त्रिंश' नामसे बोला जाता है। इस रीतिसे ये शब्द क्रिया-रूप गुणके सामान्य मात्रको लेकर अन्यत्र अन्यत्र अर्थोंमें रहते हैं। जैसे कि—ये हैं, ऐसे ही और शब्दोंमें भी ऊहा या कल्पना करना। और कल्पना करके अर्थ सामान्यसे निर्वचन करना। स्वर और वर्ण सामान्यके बहुत उदाहरण हैं, अर्थात् जितने नैगम शब्द शब्दीय, काण्डमें आवेंगे सब स्वर-वर्ण सामान्यमात्रसे ही निर्वचन किये जाते हैं। निरुक्तमें कारक, हारक, लावक, — आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति नहीं की जाती, क्योंकि—उनकी व्युत्पत्ति सीधी और व्याकरणमें प्रसिद्ध

६ २ अ० १ पा० १ खं० । है। अर्थात् जो शब्द दुर्बोध्य या परोक्षवृत्ति तथा अपरोक्षवृत्ति हैं, जैसे—बिल्म, कुदरं, उदार, चैतस, पव आदि शब्द हैं वेही व्युत्प- तिके साथ निर्वचन किये जाते हैं। उन्हीं शब्दोंमें निरुक्तकी विशे- षरूपसे सार्थकता है। उन्हींको अर्थ सामान्यसे या शब्द सामा- न्यसे निर्वचन करे। उनमैं व्याकरणोक्त संस्कारका आदर न करे। व्याकरणके अनादरका मुख्य कारण यह है कि—परोक्षवृत्ति शब्द जो 'असमर्थ स्वर संस्कार' नामसे विभाग किये जा चुके हैं, उनकी व्याकरणके अनुसार चलने या न चलने पर, भी किसो अर्थमें वृत्ति नहीं टिकती, अपितु नानाभावसे अनेक अर्थोंमें जाती है, नहीं निश्चय होता किं—“ऐसे होगा ? या ऐसे होगा ?” विचार करते हुए मनुष्य विरुद्धपक्षसे मोहको प्राप्त होजाते हैं। जब कि—इनकी वृत्ति उक्त प्रकारसे अवस्थित नहीं होती, तो व्याकरणके पीछे लगे ही रहनेसे क्या होगा ? इससे व्याकरण पर नितराम् निर्भर नहीं रहना होगा । शब्दोंकी वृत्तियोंके भेद । (१) कोई शब्द अर्थके सादृश्यसे कहीं, (२) कोई स्वरके सादृश्य से कहीं, (३) और कोई वर्णके सादृश्यसे कहीं, रहते हैं। इसी प्रकारसे विभक्तियोंका भी पूर्व-पर प्रकरणोंके अविरोध पूर्वक अर्थके अनुसार परिवर्त्तन होता है। क्योंकि—उनका भी व्यत्यय या विप- रीतभाव देखा जाता है। जैसे कि—वैयाकरणोंने कहा है— “सुपांस्थाने सुपोभवन्ति”— इसका तात्पर्यार्थ यह है कि—चाहे जिस विभक्तिके स्थानमें चाहे जो विभक्ति होजाती है। जैसा कि—आचार्य (दै० कां० ६, ३, १२ ) दिखावेंगे भी-‘हृत्सुशोकैः” ७-१‘हृदयानिशोकैः’ इत्यादि। अर्थात् यहां द्वितीयाके एक वचनके बदलेमें, उसका बहु वचन लिया जाता है।

हिन्दी निरुक्त । ७ इसी प्रकार व्याकरणमें अर्थके अधीन शब्दका विपर्यय भी होता है—"प्रत्तम् अवत्तम्-इति धात्वादावेव शिष्येते" • इत्यादि । डुदाञ् दाने (जुहोत्यादि) धातु और 'प्र' उपसर्ग दोनोसे 'प्रत्त' शब्द बनता है। यहाँ पर 'द्-आ' (दा) धातु है, उससे परनिष्ठा प्रत्ययका 'त' कार है वहां "दोद्दद्घोः" (पा० ७, ४, ४६) इसकी अनुवृत्ति लेकर "अच उपसर्गातः" (पा० ७, ४, ४७) से 'आ' का 'त' कार बन जाता है। "झरोझरि सवर्णे" (पा० ८, ४, ६५) सूत्रसे धातुके अन्त तकारका लोप होजाता है। "खरि च" (पा० १, ४, ५५) सूत्रसे 'द्' कारका 'त' कार होने पर "परः संनिकर्षः संहिता" (पा० १, ४, १६) सूत्रसे धातुका तकार प्रत्ययके तकारसे मिल जाता है, जिसकी "हलोनन्तराः संयोगः" (पा० १, १, ७) सूत्रसे संञ्जा होती है। फिर प्रादि समास होने पर "प्रत्त' यह शब्द बनता है। इसी प्रकार 'दो अवखण्डने' धातुके आदिमें 'अव' उप- सर्ग जोड़ देनेसे 'अवत्त' शब्द बनता है। यहाँ पर 'द्' और 'ओ' धातु है, उसके 'ओकारका आकार' बनजाने पर त भाव लोप- त-पर अक्षरमें मिलना तथा प्रादि समाप्त यह सब संस्कार पहिले शब्दके समान ही होते है। जिस प्रकार इन दो धातुओंके आदि वर्ण ही शेष रहते हैं, ऐसे ही और शब्दोंमें भी और और धातुओंके अक्षरोंके परिवर्तन आदि प्रक्रिया जानी जा सकती है। इन 'प्रत्त' और 'अवत्त' दो उदाहरणोंमें वैयाकरणोंकी प्रक्रियाके देखनेसे प्रतीत होगा, कि—वे छोटे छोटे एक एक शब्दके लिये तोड़ फोड़ लगाते हैं, यह केवल उनकी इच्छानुसार शब्दकी व्युत्प- त्तिके लिये कल्पित उपाय ही है, वह कोई नियत धर्म नहीं है कि- और वैयाकरण या नैरुक्त भी इन शब्दों या और शब्दोंमें इन्हींकी चाल पर व्युत्पत्त करें, किन्तु इनके समान औरोंको भी इस कार्यमें स्वतन्त्रता है, कि—वे जिन शब्दोंमें उनकी व्युत्पत्तिके अनुसार जो

८ २ अ० १ पा० १ खं० । चाहे-उपाय करें। * इसीसे वैयाकरणोंमें सर्व प्रतिष्ठित * पतञ्जलि मुनिने कहा है कि— “उपेय प्रतिपत्त्यर्थमुपाया अव्यवस्थिताः”— जो वस्तु या कार्य तुझें करना है, उसके लिये उपाय नहीं है, जिन उपायोंसे शीघ्रता तथा लाघवसे कार्य होसके उन्हीं उपा- योंका तुम अवलम्बन करो । इसी विचारको दृढ़ करनेके लिये संक्षेपसे वैयाकरणोंके उपायों को दिखा देते हैं, कि-उनके अनुसार नैरुक्तोंको भी सुभीता होगा, वे भी शब्दों के निर्वचन कर्ममें उन उपायों का अवलम्बन करेंगे । तथा वैसा करनेसे वैयाकरणोंके उपालम्भपात्र वनेंगे, एवम् उनके सादृश्य पर और और उपाय भी कल्पित कर सकेंगे ॥ १ ॥ ————— ( खं० २ ) अथापि अस्ते निवृत्ति स्थानेषु आदि लोपो भवति । स्तः, सन्तः, इति । अथापि अन्त लोपो भवति । गत्वा, गतम्, इति । अथापि उपधा लोपो भवति । जग्मतु , जग्मुः, इति । अथापि उपधा विकारो भवति । राजा, दण्डी, इति । अथापि वर्ण लोपो भवति । “तत्वायामि” इति । द्विवर्ण लोपः । तृचः इति । अथापि आदि विपर्ययो भवति । ज्योतिः, घनः, विन्दुः, वाट्यः, इति । ————————————————

  • यथोत्तर मुनीनां प्रामाण्यम् ।

हिन्दी निरुक्त। ६ अथापि आद्यन्त विपर्य्ययो भवति ! । स्तोकाः । रज्जुः। सिकताः । तर्कि, इति । अथापि अन्तव्याप- त्तिर्भवति ॥ २ ॥ अर्थः- और ‘अस्’ भुवि ( अदा० प०) धातुके गुण और वृद्धिके अभाव- स्थलमें आदिवर्णका लोप होता है। [जैसे-] स्तः। सन्तिः । और अन्तके वर्णका लोप होता है। [जैसे-] गत्वा । गतम् । ‘गम्लृ’ गतौ, (भ्वा० प० ) धातुके ‘त्वा’ प्रत्यय और ‘क्त’ प्रत्ययमें ‘म्’ कारका लोप होता है। और उपधाका लोप होता है। जग्मतुः । जग्मुः । [यहां ‘गम्लृ’ गतौ धातुके उपधा अकारका लोप होता है।] और उपधा या अन्त्य वर्णसे पूर्व वर्णको विकार होता है। [जैसे-] राजा। दण्डी । [ ‘राजन्’ ‘दण्डिन्’ इन शब्दोंमें ‘अ’ ‘इ’ को दीर्घ होता है । ] और वर्णका लोप होता है। [जैसे-] “तत्वायामि” [ ऋ० सं० १, २, १५, १ ] [ ऋ० सं० ५, ७, २६,४ ] [ ‘त्वाम्’ के ‘म्’ कारका लोप होता है।] दो वर्णोंका लोप । [जैसे-] तृचः । [ त्रि+ऋच्में ‘र्’ और ‘इ’ का लोप होता है।] और आदि अक्षर फेर बदला होता है। [जैसे-] ज्योतिः । [‘द्युत’ दीप्तौ, (भ्वा० आ० ) धातुके ‘द्य’ कारका ‘ज’ कारसे पलटा होता है।] घनः । । [ ‘हन’ हिंसागत्योः, ( अदा० प० ) धातुका ‘ह्’ कार ‘घ’ कारसे पलटता है । ] विन्दुः । [ भिदिर् विदारणे (रु० उ० ) से।] बाध्यः । [ ‘भट’ भृतौ, (भ्वा० प० ) धातुसे होता है ।] और आदि अन्त दो अक्षरोंका पलटा होता है। [जैसे ] स्तोकाः । [ ‘श्च्युतिर्’ क्षरणे, (भ्वा० प० ) धातुके ‘श्च’ कार ‘त’ कारका बदला होता है।] रज्जुः । [ ‘सृज विसर्गे, (दि० आ० तु० २

६० | २ अ० १ पा० २-३ खं० ।

प०) धातुसे बनता है।] सिकताः। ['कस' विकसने] (भ्वा० प०) धातुसे होता है।] तर्कु । ['कृती' छेदने, [तु० प०] धातुसे होता है।] और अन्त अक्षरको आदेश होता है। ॥ २ ॥ (खं० ३) ओघः, मेघः, नाधः, गाधः, वधूः, मधु,-इति। अथापि वर्णोपजनः,-‘आस्थ्यत्’ ‘द्वारः’ भरूजः’- इति। तद् ‘यत्र स्वराद् अनन्तराऽन्तस्थान्तधातु भवति तद्-द्विप्रकृतीनां स्थानम्’—इति प्रदिशन्ति। तत्र सिद्धायाम्-अनुपपद्य-मानायाम् इतरया उप पिपादयिषेत्। तत्रापि एके अल्प निष्पत्तयो भवन्ति। तद् यथा एतद्-‘ऊतिः’ ‘मृदुः’ ‘पृथुः’ ‘पृषतः’ ‘कुणारुम्’-इति। अथापि भाषिकेभ्यो धातुभ्यो नैगमाः कृतो भाष्यन्ते। ‘दमूनाः’ ‘क्षेत्र- साधाः’ इति। अथापि नैगमेभ्यो भाषिकाः। ‘उष्णम्’ ‘घृतम्’ इति। अथापि प्रकृतय एव एकेषु भाष्यन्ते, विकृतयः एकेषु ॥ ३ ॥ अर्थ:-- [उदाहरण] ['वह' प्रापणे (भ्वा० उ०) धातुसे] ओघ, ['मिह' सेचने (भ्वा० प०) धातुसे] मेघ ['णह' बन्धने (दि०- उ०) धातुसे] नाध, ['गाह' विलोडने (भू० आ०) धातुसे] गाध, ['वह' प्रापणे (भू० उ०) धातुसे] वधू, ['मद' तृप्तौ (चु० आ०) धातुसे] मधु, [शब्द होता है।] ॥

[Page Header: हिन्दी निरुक्त । ११]

और भी—वर्णकी उत्पत्ति होती है। [जैसे] 'आस्थत्' ['असु' क्षेपणे (दि० प०) धातुसे, ['वृङ्' संभक्तौ (भ्वा० आ०) धातुसे ] 'वार' और [ 'भ्रस्ज' पाके (तु० उ०) धातुसे ] 'भरूज' शब्द बनता है ॥ [द्विस्वभाव धातुका लक्षण ] सो-जहां या जिस धातुरूपमें स्वरसे पूर्व या पर व्यवधान रहित अन्तस्थ (य, र, ल, व, मेंसे कोई) वर्ण धातुके मध्यमें हो, वह द्विस्वभाव धातुओंका स्थान है, ऐसा आचार्य कहते हैं। वहां जो अर्थ सिद्ध या निश्चित है, वह एक रूपसे सिद्ध न हो, तो दूसरे धातु रूपसे उपपादन करे या घटावे। वहां पर भी यह देखना चाहिये, कि—कोई धातु थोड़े ही प्रयोगोंमें सप्रसारणी होते हैं। सो जिस प्रकार यह—'ऊति'—गत्यर्थक 'अव' (भ्वा० प०) धातुसे, 'मृदु'-'म्रद्' मर्दने (भ्वा० आ०) धातुसे 'पृथु' 'प्रथ' प्रख्याने (भ्वा० आ०) धातुसे, 'पृषत'-'प्रुष' दाहे (भ्वा० प०) धातुसे और 'कुगाह' शब्द 'कग' शब्दे (भ्वा० प०) धातुसे होता है। और भी—[द्रष्टव्य यह है] लौकिक धातुओंसे वैदिक कृदन्त शब्दोंका निर्वचन होता है। [जैसे] 'दमूनाः' 'दम' उपशमे (दि० प०) धातुसे, और 'साध' संसिद्धौ (स्वा० प०) धातुसे सिद्ध होता है। और भी-[द्रष्टव्य यह है] वेद प्रसिद्ध धातुओंसे भाषिक या लोकके शब्द [निर्वचन किये जाते हैं।] [जैसे] 'उष्ण-शब्द 'उष' दाहे [वेद प्रसिद्ध, भ्वा० प०] धातुसे और 'घृत' शब्द 'घृ' क्षरण दीप्त्योः (जु० प०) धातुसे होता है। और भी-[देखना चाहिये] कोई स्थानोंमें धातुओंकी प्रकृति या आख्यात रूपोंसे व्याख्या की जाती है, और कोई स्थानोंमें धातुओंकी विकृति या नाम रूपोंसे व्याख्या की जाती है॥३॥

१२ २ अ० १ पा० २-३ खं० । व्याख्या—( खं० २, ३ । ) उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था । ( १ ) आदिलोप । स्तः । सन्ति । यह दोनों प्रयोग 'अस्' धातुके होते हैं। इनमें धातुके आदि 'अ'का लोप हो जाता है। जहां वृद्धि या गुण नहीं हो सकता । ( २ ) अन्तलोप । गत्वा । गतम् । यह दोनों शब्द 'गम्' धातु- से बनते हैं, इनमें गम्के अन्त 'म्'का लोप होता है । ( ३ ) उपधालोप । जग्मतुः । जग्मुः । यहां दोनो स्थानोंमें 'गम्' धातुके 'ग्-अ-म्'मेंसे 'अ' का लोप होता है । अन्त- से पहिले अक्षरको उपधा कहते है । ( ४ ) उपधा विकार¹ । राजा । दण्डी । इन दोनोंमें उपधा 'अ' तथा 'इ' को दीर्घ होता है । राजन् ( र्-आ-ज्-अ-न् ) दण्डिन् ( द्-अ ण् ड्-इ-न् ) पहिलेमें 'अ' और दूसरेमें 'इ' उपधा है । यहां 'अ' १—विकारका प्रयोजन यह है कि-एक अक्षरके बदलेमें दूसरा अक्षर हो जाना, जैसे—'अ' का 'आ' और 'इ' का 'ई' । लोपमें वह अक्षर उठ जाता है, किन्तु उसके बदलेमें और अक्षर नहीं आता ।

हिन्दी निरुक्त । १३ उपाङ्गका नाम । उदाहरण । व्यवस्था । 'आ' से और 'लृ', 'ई' से बदलता है । दीर्घ होते ही अन्त न्'का लोप होजाता है । २-* ( ५ ) वर्णलोपः । तत्त्वायामि । यह वैदिक उदाहरण है, यहां 'याचामि'का 'यामि' रह गया है । 'चा'का लोप होता है । लोकमें इसके स्थानमें याञ्चे'पद बनता है । ( ६ ) द्विवर्णलोप तृचः । 'त्रि-ऋच्' दो शब्दोंसे 'तृच्' बनता है । यहां २—तत्त्वायामि ब्रह्मणा वन्दमान स्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेळमानो वरुणेह बोध्युरु शंसमान आयुः प्रमोषीः ॥ [ ऋ० सं० १, २, १५, १ । ] *—इस त्रिष्टुप् छन्दसे उपाकरण किये हुए शुनःशेप (ऋषि- पुत्र ) ने वरुणकी स्तुति की है। इस ऋचासे साग्निक ऋतुओंमें समिष्ट यजुःके उत्तरकालमें आज्य ( घृत ) की आहुति होती है । और चातुर्मास्योंमें वरुणप्रघासमें यह वरुण देवताके हविष्की याज्या है । हे वरुण ! तुझसे मैं वेदसे स्तुति करता हुआ, याचना करता हूं, और जिस वस्तुको मैं मांगता हूं, उसीको यह यजमान भी तेरे लिये संस्कृत हविषोंको प्रस्तुत किये हुए तुझसे मांगता है । सो तू क्रोध न करता हुआ ( क्योंकि-जिससे कुछ मांगा जाता है, वह क्रोध करता है ) जान, या चेत कर । हे बहुस्तुत्य ! वरुण ! और चेत करके हम दोनोंके वाञ्छितको पूरा कर, कि—हमारी आयुको नष्ट मत कर, अर्थात् हमारे अभिप्रायको सिद्ध कर ।

२४ २ अ० १ पा० २-३ खं० । उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था । 'त्रि' (त्-र्-इ) में र् और इ का लोप होने पर त्, ऋचके ऋसे मिल जाता है। व्याक- रणमें यह सप्रसारणके द्वारा होता है। उसीका यह स्पष्टीकरण है। (७) आदि विपर्यय । ज्योतिः । घनः । विन्दुः । वाट्यः । द्युत् दीप्तौ धातुके द् का ज् बननेसे ज्योतिः सिद्ध होता है। हन् हिंसा- गत्योः इस धातुसे 'घनः,' 'भिदिर्' 'बदा- रणे' (रु० उ०) धातुसे 'विन्दुः' और 'भट' भृ- तौ (भ्वा० प०) धातुसे 'वाट्यः' बनता है। (८) आद्यन्तविपर्यय । स्तोकाः । रज्जुः । सिकताः । तर्कु । 'श्रु च्तिर' क्षरणे (भू० प०) धातुके आदि तथा अन्त दोनों अक्षरोंका परिवर्त्तन होनेसे 'स्तोक' शब्द बनता है। ऐसे- 'सृज' विसर्गे (-दि० आ० तु० प०) धातुसे

हिन्दी निरुक्त । १५ उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था । 'रज्जुः,' 'कस' विक्र- सने धातुसे 'सिकता' और 'कृती' छेदने (तु० प०) धातुसे तर्क शब्द बनता है। (६) अन्तव्यापत्ति-(क) ओघः । 'वह' (भू० उ०) प्रापण, अन्त 'ह्' का घ् । (ख) मोघः । 'मिह' (भू० प०) सेचने, अन्त 'ह्' का घ् । (ग) नाधः । णह (दि० प०) बन्धने, अन्त ह् का ध् । (घ) गाधः । गाहू (भू० आ०) विलोडने अन्त ह का ध् । (ङ) वधूः । वह (भू० उ०) प्रापणे, अन्त ह् का ध् । (च) मधु । मद (चु० आ०) तृप्तौ अन्त द् का ध् । (१०) वर्णोपजन । (क) आस्थत् । 'असु' (दि० प०) क्षेपणे, [वर्णकी उत्पत्ति या आगम] थ् का आगम । (ख) द्वारः । वृङ् (क्र्या० आ०) संभक्तौ, द् का आगम । (ग) भरूज । भ्रस्ज (तु० उ०) पाके, ऊ का आगम । इस उपर्युक्त प्रकारसे लक्षण-प्रधान (जिसमें लक्षणहीकी प्रभा- नता है, किन्तु अर्थकी नहीं) व्याकरण शास्त्रमें भी शब्दोंमें अर्थके अनुसार लोप, आगम तथा विपरिणाम देखा गया है, फिर अर्थ-

हिन्दी निरुक्त । १७ द्विस्वभाव ( उभय प्रकार ) धातुका लक्षण । जिस धातुमें अकार आदि स्वरसे पूर्व या पर अन्तःस्थ अर्थात्-य, र, ल, व, में से कोई वर्ण हो, वह धातु द्विस्वभाव होता है। जैसे-यज देव-पूजा संगति करण दानेषु ( भ्वा० उ० ) धातु है । इसमें अकारसे पूर्व ‘य’ आया है। इस धातुकी दो शब्द प्रकृति हैं, सम्प्रसारण पक्षमें ‘इष्टवान्, इष्टः इष्ट्वा । और असम्प्र- सारणपक्षमें-यष्टा, यष्टुम्, यष्टव्यम् । इस ज्ञानसे यह लाभ उठाना चाहिये कि-जहां एक प्रकारसे अर्थ सिद्धि न हो, वहां दूसरे प्रकारसे करना चाहिये । प्रयोजन यह है कि-सम्प्रसारण तथा असम्प्रसारण प्रकृति दोनोंमें से, जिसी- से शब्दके अर्थकी उपपत्ति होती दिखाई दे, उसीसे उपपादन कर- नेकी इच्छा करे । अथवा दोनों ही प्रकारसे अर्थका उपपादन न होसके तो, स्वयम् अपनी इच्छानुसार उत्पत्ति कर निर्धारण-पूर्वक जिस जिस प्रकारसे अर्थ उपपन्न हो, या घटे, वैसे ही उपपादन करे या घटावे । यदि लक्षण-शास्त्र ( व्याकरण ) से हो सके तो, उसीके नियमसे करे, क्योंकि-अर्थकी प्रधानता है, उसको हर उपायसे सिद्ध करना चाहिये-यही सिद्धान्त है । अल्प निष्पत्ति धातु । सम्प्रसारणवाले धातुओंमें कोई धातु ऐसे होते हैं, जिनमें बहुत ही अल्प संप्रसारण होता है । वे भी ध्यानमें रखने चाहियें । ( “य,’ ‘इ’ से, ‘व,’ ‘उ’ से ‘र,’ ‘ऋ’ से और ‘ल’, लृ” से बदलनेको संप्रसारण कहते हैं ।) जैसे-ऊतिः । मृदुः । पृथुः । पृषतः । कुणारम् । अवगत्य- र्थक ( भ्वा० प० ) को क्ति-प्रत्यय होने पर, “छ्वोः शूडनुनासिके च” ( पा० ६, ४, १६ ) सूत्रके अनुवर्तनमें “ज्वरत्वरस्त्रिव्यविमवा- मुपधायाश्च” ( पा० ६, ४, २० ) सूत्रसे ऊठ्-भाव किया जाता है, ३

१८ २ अ० १ पा० २-३ खं० । उससे 'ऊति' यह शब्द होता है । म्रद् मर्दने (भ्वा० आ०) का मृदु होता है। रेफका प्रसारण होनेसे ऋकार होता है । ऐसे ही प्रथ प्रख्याने (भ्वा० आ०) का 'पृथु' होता है । प्रुष दाहे (भ्वा० प०) का 'पृषत' होता है । क्ण शब्दे (भ्वा० प०) का 'कुणारु' बनता है। निर्वचनमें लोक और वेदकी परस्परकी अपेक्षा । इस रीतिसे संप्रसारण असंंप्रसारणके विशेषसे जानने योग्य शब्दोंके निर्वचन करनेवाले पुरुषको यह और जानना चाहिये कि— 'जो जो शब्द भाषिक हैं, अर्थात् भाषा या लोकमें प्रसिद्ध हैं, उनसे वैदिक कृदन्त शब्दोंकी व्युत्पत्ति या निर्वचन किया जाता है' । जैसे—'दमूनाः, क्षेत्र साधाः” । 'दम उपशमे' (दि० प०) धातु है। उसके लोकमें 'दाम्यति अनड्वान्' बैल दमन होता है; 'दमयति अनड्वाहम् बैलको दमन करता है, 'दान्तः अनड्वान्' बैल दमन किया गया, इत्यादि प्रयोग होते हैं। और वेदमें 'दमूनाः' पदसे अग्नि बोला जाता है। वह भाषाके किसी अर्थ सामान्य पर निर्वचन कर लेना चाहिये जैसे कि—दममनाः ,— इत्यादि । अर्थात् दममें जिसका मन हो । इसी प्रकार 'साधू' (दिवा० पा०) धातु जो लोकमें बहुत आता है, उससे-'साधाः' पद होता है। “मित्रं न क्षेत्र साधसम् [ऋ० सं० ६, २, ४०, ४] 'मित्रमिव क्षेत्र साधसम्' मित्रके समान क्षेत्रका साधन करने- वाला, इत्यादि-रूपसे निर्वचन करने योग्य है । ऐसे ही नैगम, जो निगम या वेदमें ही प्रसिद्ध हैं, उन शब्दोंसे अर्थात्—उनके सादृश्यको लेकर भाषिक या लौकिक कृदन्त शब्दों- की निरुक्ति होती है ।

हिन्दी निरुक्त । १६ जैसे—"उष्णं घृतम्" 'उष दाहे' (भ्वा० पा०) धातु है । यह प्रायः वेदमें प्रसिद्ध है ।—"प्रत्युष्ट ँरक्षः प्रत्युष्टा अरातयः” ( य० वा० स० १, ७, ) इत्यादि ।—और भाषामें 'उष्ण' शब्द बोला जाता है । यह नैगम शब्दके सादृश्य पर निर्वचन किया जाता है । ऐसे ही-'घृक्षरग दीप्त्योः' (भ्वा० प०) धातु है, उसका—"आत्वा जि घर्मि” ( य० वा० सं० ११, २३ ) इत्यादि-वेद वाक्योंमे प्रयोग प्रसिद्ध है, और भाषामें 'घृतम्' पद व्यवहृत होता है, सो यह वैदिक 'घृ' धातुसे ही निर्वचनीय है। इस प्रकारसे 'लौकिक शब्दोंसे वैदिक शब्द और वैदिक शब्दोंसे लौकिक शब्दों का निर्वचन करना चाहिये । निर्वचनमें विभिन्न देश भाषाओंका परिज्ञान । निर्वचन करनेवालेको और यह एक बात ध्यानमे रखनी चाहिये कि—"कुछ देशोमे धातु शब्दोंकी प्रकृति ही बोली जाती है, और कुछ देशोंमें विकृति” । धातुका आख्यात पदके रूपमें जो प्रयोग है, वह प्रकृति कहाता है, क्योंकि—पहिले-"सब नाम आख्यातसे ही उत्पन्न होते हैं” । इस सिद्धान्तके द्वारा आख्यातको कारण बता चुके है । और 'नाम'के रूपमें जो धातुका प्रयोग होता है, वह उसकी विकृति है, यह बात भी उपर्युक्त सिद्धान्तसे ही आ जाती है ॥ ३ ॥ ( ख० ४ ) शवतिर्गतिकर्मा, कम्बोजेषु-एव भाष्यते । कम्बोजाः, कम्बलभोजाः, कमनीय भोजा वा । कम्बलः कमनीयो भवति । विकार मस्यार्येषु भा- षन्ते शव इति । दातिर्लवनार्थे प्राच्येषु, दात्र-

२० २ अ० १ पा० ४ खं० । मुदी च्येषु । संवस्-एक-पदानि निर्ब्रू यात् । अथ तद्धित समासेषु एक पर्व सु च अनेक पर्व सु च पूर्वं पूर्वम् अपरम् अपरं प्रविभज्य निर्ब्रू यात् । दण्ड्यः पुरुषः, दण्डमर्हति, -इति वा । दण्डेन सम्पद्यते इति वा । दण्डः, -ददतेः धारयति कर्म्मणः । “अक्रूरो ददते मणिम्”—इति अभिभाषन्ते । 'दम- नात्'—इति औपमन्यवः । 'दण्ड मस्या कर्षत'— इति गर्हायाम् ॥ ४ ॥ अर्थः— 'शवति' क्रिया-रूप, गति-अर्थमें कम्बोज या म्लेच्छ देशोंमें ही बोला जाता है । [ उदाहरण विशेषमें आये हुए शब्दका निर्वचन-] 'कम्बोज' नामसे कम्बलों को सेवन करनेवाले या सुन्दर पदार्थोंको खानेवाले-[ बोले जाते हैं । ] [ विग्रहमें आया हुआ शब्द-] 'कम्बल नाम वाऽउनोयका होता है । इस 'शवति' धातुकी 'शव' इस विकृति या नाम पदको आर्य-देश ( हिन्दुस्थान ) में बोलते हैं । 'दाति'—क्रिया छेदन अर्थमें प्राच्य या पूर्वी देशोंमें बोली जाती है । 'दात्र' जो इसको विकृति है, उदीच्य या उत्तरी देशोंमें बोली जाती है । इस प्रकारसे एक-पद या अखण्ड-पदोंकी व्याख्या करे । इसके अतिरिक्त एक पदवाले अथवा अनेक पदवाले तद्धित और समासोंमें पहिले पहिले और पिछले पिछलेको अलग अलग करके निर्वचन करे । [ जैसे-] 'दण्ड्यः पुरुषः,' जो पुरुष दण्डके योग्य हो । अथवा दण्डसे सिद्ध किया जावे । [ पदार्थ—निर्वचन—] 'दण्ड'-शब्द धारणार्थक 'दद्' ( भ्वा० आ० ) ध तुसे होता है ।

हिन्दी निरुक्त । २१ [ लोकमें—] 'अक्रूरो ददते मणिम्' 'अक्रूर मणिको धारण करता है'—ऐसा बोलते हैं। औपमन्यव आचार्य्य इस ( दण्ड ) शब्दको दमन क्रियाके सम्बन्धसे ( 'दम' उपशमे ( दि० प० ) धातुसे ) बना हुआ मानते हैं। [ लोकमें—] “दण्डमस्य आकर्षत”—हे सभा- सदो ! इसको दण्ड दो, ऐसा गर्हा या निन्दामें प्रयोग करते हैं ॥४॥ व्याख्या-- 'शवतिः'—कम्बोज नाम म्लेच्छ देशोंमे 'शवति' यह आख्यातकी क्रिया 'गच्छति'—( जाता है) के अर्थमें बोली जाती है, यह इस धातुका प्रकृति-रूप है। और आर्य्यदेश या हिन्दुस्थानमें इसी धातुके विकार भूत 'शव' नामसे मृतक शरीर ( मुर्दा ) बोला जाता है। इस प्रकार कोई देशोंमें प्रकृति और कोई देशोंमें धातुकी प्रकृति बोली जाती है, या कहीं चेतन, और कहीं अचेतन। कम्बोजाः—[ क-] 'कम्बलभोज' शब्दसे 'कम्बोज' शब्द बना है, क्योंकि—उन देशोंमें शीतके आधिक्यसे कम्ब- लको ओढ़ने, पहिननेमें बहुत लेते हैं; इसलिये कम्बलभोजसे ही कम्बोज बना होगा। [ ख-] अथवा 'कमनीयभोज' शब्दसे कम्बोज शब्दकी उत्पत्ति हुई। क्योंकि-उन देशोंके मनुष्य, कम- नीय—या उत्तम उत्तम वस्तुओंको उपभोग करते है। 'भुज' धातुके भोजन अर्थको लेकर काश्मीर देश कम्बोज कहा जा सकता है, क्योंकि—वहाँ अच्छे मेवे होते हैं। जिनको वहांके लोग खाते है। यदि उपभोग अर्थ लेवें तो कम्बोज उस देशका नाम हुआ, जिस समुद्रके अन्तरमें मोती आदि कमनीय रत्न पैदा होते हैं, जिसका- कि, अब भी कम्बोज नाम प्रसिद्ध है; क्योंकि-वहांके लोग कमनीय रत्नोंका उपभोग करते हैं।