भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

१२ २ अ० १ पा० २-३ खं० । व्याख्या—( खं० २, ३ । ) उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था । ( १ ) आदिलोप । स्तः । सन्ति । यह दोनों प्रयोग 'अस्' धातुके होते हैं। इनमें धातुके आदि 'अ'का लोप हो जाता है। जहां वृद्धि या गुण नहीं हो सकता । ( २ ) अन्तलोप । गत्वा । गतम् । यह दोनों शब्द 'गम्' धातु- से बनते हैं, इनमें गम्के अन्त 'म्'का लोप होता है । ( ३ ) उपधालोप । जग्मतुः । जग्मुः । यहां दोनो स्थानोंमें 'गम्' धातुके 'ग्-अ-म्'मेंसे 'अ' का लोप होता है । अन्त- से पहिले अक्षरको उपधा कहते है । ( ४ ) उपधा विकार¹ । राजा । दण्डी । इन दोनोंमें उपधा 'अ' तथा 'इ' को दीर्घ होता है । राजन् ( र्-आ-ज्-अ-न् ) दण्डिन् ( द्-अ ण् ड्-इ-न् ) पहिलेमें 'अ' और दूसरेमें 'इ' उपधा है । यहां 'अ' १—विकारका प्रयोजन यह है कि-एक अक्षरके बदलेमें दूसरा अक्षर हो जाना, जैसे—'अ' का 'आ' और 'इ' का 'ई' । लोपमें वह अक्षर उठ जाता है, किन्तु उसके बदलेमें और अक्षर नहीं आता ।