निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 181, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १३ उपाङ्गका नाम । उदाहरण । व्यवस्था । 'आ' से और 'लृ', 'ई' से बदलता है । दीर्घ होते ही अन्त न्'का लोप होजाता है । २-* ( ५ ) वर्णलोपः । तत्त्वायामि । यह वैदिक उदाहरण है, यहां 'याचामि'का 'यामि' रह गया है । 'चा'का लोप होता है । लोकमें इसके स्थानमें याञ्चे'पद बनता है । ( ६ ) द्विवर्णलोप तृचः । 'त्रि-ऋच्' दो शब्दोंसे 'तृच्' बनता है । यहां २—तत्त्वायामि ब्रह्मणा वन्दमान स्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेळमानो वरुणेह बोध्युरु शंसमान आयुः प्रमोषीः ॥ [ ऋ० सं० १, २, १५, १ । ] *—इस त्रिष्टुप् छन्दसे उपाकरण किये हुए शुनःशेप (ऋषि- पुत्र ) ने वरुणकी स्तुति की है। इस ऋचासे साग्निक ऋतुओंमें समिष्ट यजुःके उत्तरकालमें आज्य ( घृत ) की आहुति होती है । और चातुर्मास्योंमें वरुणप्रघासमें यह वरुण देवताके हविष्की याज्या है । हे वरुण ! तुझसे मैं वेदसे स्तुति करता हुआ, याचना करता हूं, और जिस वस्तुको मैं मांगता हूं, उसीको यह यजमान भी तेरे लिये संस्कृत हविषोंको प्रस्तुत किये हुए तुझसे मांगता है । सो तू क्रोध न करता हुआ ( क्योंकि-जिससे कुछ मांगा जाता है, वह क्रोध करता है ) जान, या चेत कर । हे बहुस्तुत्य ! वरुण ! और चेत करके हम दोनोंके वाञ्छितको पूरा कर, कि—हमारी आयुको नष्ट मत कर, अर्थात् हमारे अभिप्रायको सिद्ध कर ।