निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। ६ अथापि आद्यन्त विपर्य्ययो भवति ! । स्तोकाः । रज्जुः। सिकताः । तर्कि, इति । अथापि अन्तव्याप- त्तिर्भवति ॥ २ ॥ अर्थः- और ‘अस्’ भुवि ( अदा० प०) धातुके गुण और वृद्धिके अभाव- स्थलमें आदिवर्णका लोप होता है। [जैसे-] स्तः। सन्तिः । और अन्तके वर्णका लोप होता है। [जैसे-] गत्वा । गतम् । ‘गम्लृ’ गतौ, (भ्वा० प० ) धातुके ‘त्वा’ प्रत्यय और ‘क्त’ प्रत्ययमें ‘म्’ कारका लोप होता है। और उपधाका लोप होता है। जग्मतुः । जग्मुः । [यहां ‘गम्लृ’ गतौ धातुके उपधा अकारका लोप होता है।] और उपधा या अन्त्य वर्णसे पूर्व वर्णको विकार होता है। [जैसे-] राजा। दण्डी । [ ‘राजन्’ ‘दण्डिन्’ इन शब्दोंमें ‘अ’ ‘इ’ को दीर्घ होता है । ] और वर्णका लोप होता है। [जैसे-] “तत्वायामि” [ ऋ० सं० १, २, १५, १ ] [ ऋ० सं० ५, ७, २६,४ ] [ ‘त्वाम्’ के ‘म्’ कारका लोप होता है।] दो वर्णोंका लोप । [जैसे-] तृचः । [ त्रि+ऋच्में ‘र्’ और ‘इ’ का लोप होता है।] और आदि अक्षर फेर बदला होता है। [जैसे-] ज्योतिः । [‘द्युत’ दीप्तौ, (भ्वा० आ० ) धातुके ‘द्य’ कारका ‘ज’ कारसे पलटा होता है।] घनः । । [ ‘हन’ हिंसागत्योः, ( अदा० प० ) धातुका ‘ह्’ कार ‘घ’ कारसे पलटता है । ] विन्दुः । [ भिदिर् विदारणे (रु० उ० ) से।] बाध्यः । [ ‘भट’ भृतौ, (भ्वा० प० ) धातुसे होता है ।] और आदि अन्त दो अक्षरोंका पलटा होता है। [जैसे ] स्तोकाः । [ ‘श्च्युतिर्’ क्षरणे, (भ्वा० प० ) धातुके ‘श्च’ कार ‘त’ कारका बदला होता है।] रज्जुः । [ ‘सृज विसर्गे, (दि० आ० तु० २