भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

हिन्दी निरुक्त । १५ उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था । 'रज्जुः,' 'कस' विक्र- सने धातुसे 'सिकता' और 'कृती' छेदने (तु० प०) धातुसे तर्क शब्द बनता है। (६) अन्तव्यापत्ति-(क) ओघः । 'वह' (भू० उ०) प्रापण, अन्त 'ह्' का घ् । (ख) मोघः । 'मिह' (भू० प०) सेचने, अन्त 'ह्' का घ् । (ग) नाधः । णह (दि० प०) बन्धने, अन्त ह् का ध् । (घ) गाधः । गाहू (भू० आ०) विलोडने अन्त ह का ध् । (ङ) वधूः । वह (भू० उ०) प्रापणे, अन्त ह् का ध् । (च) मधु । मद (चु० आ०) तृप्तौ अन्त द् का ध् । (१०) वर्णोपजन । (क) आस्थत् । 'असु' (दि० प०) क्षेपणे, [वर्णकी उत्पत्ति या आगम] थ् का आगम । (ख) द्वारः । वृङ् (क्र्या० आ०) संभक्तौ, द् का आगम । (ग) भरूज । भ्रस्ज (तु० उ०) पाके, ऊ का आगम । इस उपर्युक्त प्रकारसे लक्षण-प्रधान (जिसमें लक्षणहीकी प्रभा- नता है, किन्तु अर्थकी नहीं) व्याकरण शास्त्रमें भी शब्दोंमें अर्थके अनुसार लोप, आगम तथा विपरिणाम देखा गया है, फिर अर्थ-