निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १७ द्विस्वभाव ( उभय प्रकार ) धातुका लक्षण । जिस धातुमें अकार आदि स्वरसे पूर्व या पर अन्तःस्थ अर्थात्-य, र, ल, व, में से कोई वर्ण हो, वह धातु द्विस्वभाव होता है। जैसे-यज देव-पूजा संगति करण दानेषु ( भ्वा० उ० ) धातु है । इसमें अकारसे पूर्व ‘य’ आया है। इस धातुकी दो शब्द प्रकृति हैं, सम्प्रसारण पक्षमें ‘इष्टवान्, इष्टः इष्ट्वा । और असम्प्र- सारणपक्षमें-यष्टा, यष्टुम्, यष्टव्यम् । इस ज्ञानसे यह लाभ उठाना चाहिये कि-जहां एक प्रकारसे अर्थ सिद्धि न हो, वहां दूसरे प्रकारसे करना चाहिये । प्रयोजन यह है कि-सम्प्रसारण तथा असम्प्रसारण प्रकृति दोनोंमें से, जिसी- से शब्दके अर्थकी उपपत्ति होती दिखाई दे, उसीसे उपपादन कर- नेकी इच्छा करे । अथवा दोनों ही प्रकारसे अर्थका उपपादन न होसके तो, स्वयम् अपनी इच्छानुसार उत्पत्ति कर निर्धारण-पूर्वक जिस जिस प्रकारसे अर्थ उपपन्न हो, या घटे, वैसे ही उपपादन करे या घटावे । यदि लक्षण-शास्त्र ( व्याकरण ) से हो सके तो, उसीके नियमसे करे, क्योंकि-अर्थकी प्रधानता है, उसको हर उपायसे सिद्ध करना चाहिये-यही सिद्धान्त है । अल्प निष्पत्ति धातु । सम्प्रसारणवाले धातुओंमें कोई धातु ऐसे होते हैं, जिनमें बहुत ही अल्प संप्रसारण होता है । वे भी ध्यानमें रखने चाहियें । ( “य,’ ‘इ’ से, ‘व,’ ‘उ’ से ‘र,’ ‘ऋ’ से और ‘ल’, लृ” से बदलनेको संप्रसारण कहते हैं ।) जैसे-ऊतिः । मृदुः । पृथुः । पृषतः । कुणारम् । अवगत्य- र्थक ( भ्वा० प० ) को क्ति-प्रत्यय होने पर, “छ्वोः शूडनुनासिके च” ( पा० ६, ४, १६ ) सूत्रके अनुवर्तनमें “ज्वरत्वरस्त्रिव्यविमवा- मुपधायाश्च” ( पा० ६, ४, २० ) सूत्रसे ऊठ्-भाव किया जाता है, ३