निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ २ अ० १ पा० २-३ खं० । उससे 'ऊति' यह शब्द होता है । म्रद् मर्दने (भ्वा० आ०) का मृदु होता है। रेफका प्रसारण होनेसे ऋकार होता है । ऐसे ही प्रथ प्रख्याने (भ्वा० आ०) का 'पृथु' होता है । प्रुष दाहे (भ्वा० प०) का 'पृषत' होता है । क्ण शब्दे (भ्वा० प०) का 'कुणारु' बनता है। निर्वचनमें लोक और वेदकी परस्परकी अपेक्षा । इस रीतिसे संप्रसारण असंंप्रसारणके विशेषसे जानने योग्य शब्दोंके निर्वचन करनेवाले पुरुषको यह और जानना चाहिये कि— 'जो जो शब्द भाषिक हैं, अर्थात् भाषा या लोकमें प्रसिद्ध हैं, उनसे वैदिक कृदन्त शब्दोंकी व्युत्पत्ति या निर्वचन किया जाता है' । जैसे—'दमूनाः, क्षेत्र साधाः” । 'दम उपशमे' (दि० प०) धातु है। उसके लोकमें 'दाम्यति अनड्वान्' बैल दमन होता है; 'दमयति अनड्वाहम् बैलको दमन करता है, 'दान्तः अनड्वान्' बैल दमन किया गया, इत्यादि प्रयोग होते हैं। और वेदमें 'दमूनाः' पदसे अग्नि बोला जाता है। वह भाषाके किसी अर्थ सामान्य पर निर्वचन कर लेना चाहिये जैसे कि—दममनाः ,— इत्यादि । अर्थात् दममें जिसका मन हो । इसी प्रकार 'साधू' (दिवा० पा०) धातु जो लोकमें बहुत आता है, उससे-'साधाः' पद होता है। “मित्रं न क्षेत्र साधसम् [ऋ० सं० ६, २, ४०, ४] 'मित्रमिव क्षेत्र साधसम्' मित्रके समान क्षेत्रका साधन करने- वाला, इत्यादि-रूपसे निर्वचन करने योग्य है । ऐसे ही नैगम, जो निगम या वेदमें ही प्रसिद्ध हैं, उन शब्दोंसे अर्थात्—उनके सादृश्यको लेकर भाषिक या लौकिक कृदन्त शब्दों- की निरुक्ति होती है ।