निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १६५ ( पर्व ) भी उसीको प्रकृति या स्वभाववाला है। [क्योंकि-] दोनोंमें सन्धि धर्म समान है। [ पहिलेमें शिलासन्धि और दूसरेमें काल सन्धि है ] । [ देवपक्षमे ] 'गिरिष्ठा' नाम मेघमें रहनेवालेका । [ क्योंकि-] 'गिरि' नाम मेघका भी है। उसी धर्म [ ऊपरको उठा हुआ होने ] से ॥ विशेष-दूसरे उदाहरणमें उपमान मृग या सिंह और उपमेय इन्द्र दोनोंके भीम, कुचर, और गिरिष्ठा, तोनों विशेषण हैं । 'भीम' का दोनों पक्षोंमें समान अर्थ है और अन्य दोनोंका अलग अलग जैसा कि अनुवादमे दिया गया है। अनुवाद । [ मन्त्रोंमें ] प्रधानतासे जिन देवताओकी स्तुति होती है, उनके सब नामोको 'दैवत' [ काण्ड ] कहते हैं। उसकी व्याख्या पीछे करेगे । यहां नैघण्टुक शब्दो ( गौण शब्दो ) की व्याख्या होगी । दूसरा 'इह' शब्द अध्यायकी समाप्तिके सूचनके लिये है, अथवा एक 'इह' शब्द 'गौः' आदि नैघण्टुक काण्डके अभिप्रायसे और दूसरा नैगम काण्ड जो 'जहा' आदि शब्दोंका समूह रूप हैं, उसके लिये है । व्याख्या । [ उदाहरण ] अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः । साम्राजन्तमध्वराणाम् । [ ऋ० सं० १, २, २३, १ ] शुनःशेपस्य आर्षं, गायत्री, वारवन्तीयानुशासने विनियुक्ता । साम्नश्च वारवन्तीयस्य एषः योनिः । हे अग्ने ! जैसे बालवाले घोड़ेकी परिचर्या या सेवा की