भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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३६६ अ० १ पा० ६ ख० ६ । जाती है, वैसे ही हम तुम तेजवाले और अध्वरों या यज्ञोंके सम्राट्‌को नमस्कारोंसे वन्दना करते हैं। इस ऋचामें 'अश्व' शब्द नैघण्टुक या गौण है और 'अग्नि' प्रधान, यह इसके अर्थसे ही प्रतीत होता है । उदाहरणके शब्दोंकी व्याख्या । 'अश्वं, न' अश्वमिव । अश्वके समान । 'वारवन्तम्' वालवन्तम् । बालवालेको । व्याख्या प्रसक्तकी व्याख्या— 'वालाः' दंशवारणार्था भवन्ति । मच्छरोंके वारण करनेवाले । व्याख्याकी व्याख्यामें आये हुएकी व्याख्या । 'दंशः' दशतेः । काटनेवाला या डसनेवाला । ( २ )—"मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आजगन्था परस्याः । सृकं संशाय पविमिंद्र तिग्मं विशत्रून् ताळ्हि विमृधो नुदस्व ॥” (ऋ० सं० ८. ८, ३८, २) गयो नामेन्द्रपुत्रः, तस्येयमर्षम् । विष्टुप् । व- मृधस्य द्विविधो योज्या । । इस ऋचामें इन्द्र प्रधान है, और “मृग” नैघण्टुक (गौण) । हे इन्द्र ! तू दूर द्युलोकसे हमारे इस कर्ममें आ। और अपने वज्रको तीखा करके पर्वतचारी अन्य प्राणियोंको संहार करनेवाले भयानक सिंहके समान हमारे शत्रुओंको मार, तथा जिनको न मारना चाहे, उनको दूर ले जा, जिसमें कि—वे फिर न आवें । उदाहरण ऋचाके शब्दोंकी व्याख्या । “मृगः” सिंह अथवा व्याघ्र । गत्यर्थक ‘मृज्’ धातुसे बनता है ।