भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 190

हिन्दी निरुक्त । २३ बताना चाहिये, पहिले पूर्व पूर्व पदोंका निर्वचन होकर पर पदोंका निर्वचन होगा या इससे उलटा ? इस प्रश्नका स्पष्ट अर्थ यह है कि- ( १ ) तद्धित युक्त पदोंमें क्या पहिले, पूर्व पदके अर्थका निर्वचन होगा ? या तद्धितके अर्थका ? ( २ ) ऐसे ही समास युक्त पदोंमें पहिले पदोंके अर्थका निर्वचन होगा ? या समासके अर्थका ? तद्धित और समास । “तद्धिताः” ( पा०-४, १, ७६ ) इस सूत्रके अधिकारमें जो प्रत्यय विधान किये गये हैं, वे तद्धित कहाते हैं । तथा “समर्थः पदविधिः” ( पा०-२, १, १ ) या “प्राक्कडारात्समासः” ( पा० २, १, ३ ) सूत्रके अधिकारमें जो संस्कार या वृत्ति विधान की गई हैं, वे समास हैं । इन दोनोंमें ही समान नियम हैं, चाहे वे एक पर्व ( एक पद ) या अनेक पर्व ( अनेक पद ) हों, उनमें पहिलेको पहिले, और पिछलेको पीछे निर्वचन करना । अर्थात् तद्धित युक्तपदमें पहिले तद्धितार्थका निर्वचन करे और पीछे पदार्थका । एवम्, समास युक्त पदोंमें पहिले समासार्थका निर्वचन करे, और पीछे पदार्थोंका । “दाण्ड्यः”—यह एक तद्धित है,और “वाष्र्ण्यायणिः” यह अनेक पद । क्योंकि यह अपने आत्मामें अनेक पदोंको लय किये हुए है । जैसे “वृषस्यापत्यं-वार्ष्यः” वृषका अपत्य या सन्तान वार्ष्य, और ‘वार्ष्यस्यापत्यं = वाष्र्ण्यायणः’ वार्ष्यका सन्तान वाष्र्ण्यायण, तथा- ‘वाष्र्ण्यायणस्य अपत्यं वाष्र्ण्यायणिः’ वाष्र्ण्यायणका अपत्य वाष्र्ण्यायणि होता है । ऐसे ही एक शेष, एक पद समास होता है, जिसको विधान “सरूपाणामेकशेष एक विभक्तौ” ( पा०-१, २, ६४ ) सूत्रसे होता है, जैसे कि -“पुरुषश्च पुरुषश्च पुरुषौ” दो पुरुष शब्दोंमेंसे एक