निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। २५ ( १ ) तद्धित । "दण्ड्यः पुरुषः "-'दण्ड्य' शब्द एकपद तद्धित है, और पुरुष शब्दका विशेषण है; इसकी व्युत्पत्ति-(तद्धितार्थ निर्वचन) ( क ) 'दण्डमर्हति' किसी अपराधमें योग्य को 'दण्ड्य' कहते हैं। ( ख ) अथवा 'दण्डेन वा कार्षापणादिना सम्पद्यते, संयुज्यते दण्ड्यः,' दण्ड जो कार्षापण आदि राजनियत मुद्रा आदि जुर्माना उससे संयुक्त किया जाय । पदार्थ निर्वचन । "दण्डः"-'दण्ड' धारणार्थक 'दद्' धातुसे बनता है । "धार्यते ह्येषोऽपराधेषु राजाभिः" राजा लोग अपराधोंके समय इसको धारण करते हैं, इससे यह दण्ड कहाता है। 'दद्' धातुका धारण अर्थ लोक और वेद दोनों स्थलोंमें देखा जाता है। जैसे-वेदमें "विश्वेदेवाः पुष्करे त्वा ददन्ते" (ऋ०सं० ५, ३, २४, १) विश्वेदेवता पुष्करमें तुझे धारण करते हैं। और लोकमें "अक्रूरो ददते मणिम्" अक्रूर स्यमन्तक मणिको धारण करता है। औपमन्यव आचार्य, दमनक्रियाके सम्बन्धसे 'दमु उपशमे' (दि० प०) धातुसे बनता है, क्योंकि जो पुरुष अदान्त = नियमसे बाहर चलनेवाला होता है, उसे दण्डके द्वारा ही दमन करते हैं। इसीसे यह कहा गया है कि-"अदान्तोंका दमन करे" लोकमें भी जो कोई पुरुष अदान्त होता है, उसके लिये कहते हैं "दण्डमस्या- कर्षत" हे सभासद् गणों ! इसको दण्डित करो, उसीसे यह दान्त या दमनशील होगा', ऐसा निन्दामें प्रयोग किया जाता है।