भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

हिन्दी निरुक्त । २७ कक्ष कहते हैं । [ समासका उदाहरण ] राज्ञका पुरुष राज- पुरुष कहलाता है । [ पदार्थ ] ‘राजन्’ शब्द दीप्ति-अर्थ ‘राजृ’ (भ्वा० उ०) धातुसे है । ‘पुरुष’ नाम पुरिषादका है। [क्योंकि—] वह पुर् नाम शरीर अथवा बुद्धिमें रहता है । [ अथवा ] पुरिशय या शरीरमें सोनेवाला होनेसे पुरुष है । अथवा ‘पूरी’ आप्यायने (चु० उ०) धातु से ‘पुरुष’ है। भीतरसे सब जगत्को व्यापन करता है, इस प्रकार अन्तर-पुरुषके अभिप्रायसे । [निगम ] जिससे पर अथवा पूर्व कुछ नहीं है, जिससे सूक्ष्म अथवा स्थूल या मोटा कुछ नहीं है, वृक्षके समान निश्चल भावसे अकेला आकाशमें खड़ा है, उससे यह सब जगत् पूर्ण या व्याप्त है ।” यह भी निगम है ॥५॥ व्याख्या-- २य, तद्धितका उदाहरण । ( तद्धितार्थ निर्वचन ) “कक्ष्या” । ‘कक्ष्या’—यह तद्धित है । घोड़ेके चारजामेके कसनेकी रस्सीको कक्ष्या कहते हैं । क्योंकि—वह कक्षको सेवन करती है, या उससे संयुक्त होती है, अथवा उसमें रहती है। पदार्थका निर्वचन । कक्षः—विलोड़नार्थक ‘गाह’ धातु (भ्वा० आ०) से ‘कक्ष’ शब्द बनता है। क्योंकि—कक्षों या बगलोंमें ही किसी दबाने योग्य वस्तुको विलोडन करता या दबाता है। ‘गाह’ धातुसे ‘क्स’ प्रत्यय जुड़नेसे ‘कक्ष’ हो जाता है। और सब कुछ जो आ- द्यन्त विपर्यय आदि होता है, वह जैसा दिखाया है, अथवा जैसा सम्भव हो, जहां तहां कार्यस्थलमें यथासम्भव योजन कर लेना चाहिये ।