निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ २ अ० १ पा० ५ खं० । अथवा 'ख्या' धातुका अनर्थक अभ्यास (दोहराये हुए धातुका पहिला रूप ) ककार है । अर्थात् 'ख्य' का 'कख्य' होकर 'कक्ष' हो गया । अथवा ककार सार्थक ही है, अनर्थक नहीं । कैसे ? “किमस्मिन् ख्यातम्” इति कक्षः । अर्थात् क्या इसमें ख्यात वा प्रसिद्ध करने योग्य कुछ नहीं। क्योंकि—देखनेमें नहीं आता, या छिपाने योग्य है। इस अर्थके अनुसार 'किंख्या' शब्द होकर ‘कक्ष' शब्द हो जाता है। अथवा—‘कष,-विलेखने' (भ्वा० प०) धातुसे ‘कक्ष' शब्द बनता है, क्योंकि—वह नित्य काल ही स्वेदशील होनेसे खुजली पैदा करता रहता है, इसीसे उसे (बगलको) नखोंसे नित्य खुजाते हैं, इस रीतिसे कषण-क्रियाके सम्बन्धसे ‘कक्ष' शब्द बन जाता है। उसके सादृश्यसे मनुष्यका कक्ष भी कक्ष कहलाता है। अश्वका भी जो बाहुका मूल देश है, वह ‘कक्ष’ कहलाता है। और उसको सेवन करनेसे अश्वके तंगको 'कक्ष्या' कहते हैं । अन्य टीकाकारोंका मत । “पूर्वं पूर्वमपरमपरं प्रविभज्य निर्ब्रूयात्” ( नि० अ० २, पा० १ ख ० ४ ) इस वाक्यकी पहिले व्याख्या की गई है, कि—“तद्धित व समास युक्त पदोंमें पहिले तद्धित व समासके अर्थका निर्वचन करना, और पदोंके अर्थका निर्वचन पीछे करना।” किन्तु कोई टीकाकार इसकी व्याख्या दूसरे प्रकारसे करते हैं कि—“पहिले जो पद हो, उसकी निरुक्ति पहले ही करना, तथा जो पद पीछे आवै उसकी व्याख्या पीछे ही करना” अर्थात् इनके मतमें यह बचन तद्धित और समासके लिये नहीं है, किन्तु पदोंके निर्वचन मात्रकी व्यवस्था करता है, इस लिये तद्धित-समासमें निर्वचन