निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० २ अ० १ पा० ५ खं० । पदके अर्थका निर्वचन । पूर्वोक्त नियमके अनुसार समासार्थका निर्वचन करके पदार्थका निर्वचन करते हैं-“राजा” ‘राज़ृ’ दीप्तौ, ( भ्वा० उ० ) से ‘राजा पद बनता है। क्योंकि-वह पांच लोकपालोंके शरीरसे दीप्तिमान् होता है। “पुरुषः” ‘पुरुष’ शब्द पुर् शब्द, जो शरीर या बुद्धिका नाम है, सद् ( षदॢ ) विशरण गत्यवसादनेषु ( भ्वा० प० ) धातुसे बनता है। क्योंकि-वह शरीर व बुद्धिमें विषयोंको उपलब्धि या अनुभ- वके लिये रहता है। इससे ‘पुरिषाद’ होकर पुरुष शब्द बन गया । अथवा-उसी ‘पुर’ शब्दके साथमें ‘शीङ्, स्वप्ने’ ( अदा० आ० ) धातु मिलकर ‘पुरिशय’ शब्दसे ‘पुरुष’ शब्द बना। क्योंकि-वह विशेषकर उन दोनोंमें शयन या स्थिति करता है। अथवा-पूरयति ( पूरो आप्यायने ) ( चु० ) धातुसे ही ‘पुरुष’ शब्द बना। क्योंकि-इस पुरुषसे व्यापक होनेके कारण सब जगत् पूर्ण है। अथवा-‘पूरयति अन्तः’ जिससे कि-यह भीतर ही पूर्ण रहता है, इस व्युत्पत्तिके सहारे अन्तर पुरुषके अभिप्रायसे उसी धातुसे ‘पुरुष’ शब्द बना। ( यह बात प्रासङ्गिक है । ) उक्त व्युत्पत्तिके प्रमाणमें निगम । “यस्मात् परं नापर मस्ति किञ्चिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् । अर्थ-जिससे पर या अपर कुछ नहीं है, जिससे छोटा अथवा बड़ा कुछ नहीं है। यह अभिप्राय है कि-सब वही है। प्रकाश-