निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ३५ कारणसे स्वतन्त्रतापूर्वक निर्वचन न करे। क्योंकि-उन शब्दोंके अर्थका निश्चय प्रकरणसे या उसके समीपस्थ पदोंके सहारेसे होता है। यदि प्रकरणको न समझ कर अन्यथा ही निर्वचन करेगा, तो प्रत्यवाय या पापके सम्बन्धसे हानि होगी। जैसे कि—“जहा” (४, १, १) यह ‘एकपद’ है, यदि प्रकरण अथवा उपपदकी उपेक्षा करके इसकी व्याख्या की जाय, तो नहीं जाना जाता—‘क्या यह ‘हन्’ धातुका है, या ‘ओहाक् त्यागे’ (जुहो० प०) का ।’ जबकि—प्रकरण और उपपदकी अपेक्षासे इसका निर्वचन करते हैं, तो “मान एकस्मिन्” (ऋ० सं०-६, ३, ४८, ४) में “मावधीः” यह पद है, उसीसे-“यह ‘हन्’ धातुका ही रूप है,” यह निश्चय हो जाता है। जिस पदके प्रकरण और समीपवर्ती पदका उज्ञान हो जाता है, उसीका अर्थ करना समञ्जस या न्याययुक्त होता है, इस रीतिसे जिन शब्दोंके संस्कारोंका पता नहीं है, ऐसे ‘एकपद’ शब्दोंका निर्वचन प्रकरण अथवा उपपदकी सहायतासे किया जा सकता है। इसीलिये ‘एकपद’ शब्दोंके निर्वचनका निषेध किया है। समाम्नायके श्रवणका अधिकारी । निर्वचनका लक्षण कहा गया, किन्तु अब उस पुरुषका लक्षण कहना चाहिये, जिसके लिये, ऐसे निर्वचनवाले समाम्नायका उप- देश किया जावे। इस कारण अब उस श्रवणके अधिकारीका लक्षण कहते हैं। त्याज्य श्रोता । १—“नावैयाकरणाय”। जिसने व्याकरण-शास्त्र नहीं पढ़ा हो, क्योंकि-वह लक्षणका जानकार न होनेसे व्युत्पत्तिपूर्वक