निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ २ अ० १ पा० ६ खं० । निर्वचन करने पर भी न समझेगा तथा श्रमकी व्यर्थता होगी। २—"नानुपसन्नाय"। "क्या ही इसने बड़ा अद्भुत काम किया है, जोकि-इसने व्याकरण पढ़ लिया है"—ऐसे गौरवके साथ उस वैयाकरणको भी यह शास्त्र न पढ़ाया जाय जो गुरुका अभक्त हो। क्योंकि-धर्म सर्वथा ही अपरित्याज्य है, इससे वैयाक- रणको भी, उसीको पढ़ाना जो सच्ची शिष्यवृत्ति रखता है। ३—(क) "अनिदंविदे" वैयाकरण भी कोई जड़ होता है, जिसको समझाने पर भी नहीं समझ पड़ता। जिससे कि-इस शास्त्रमें देवता आदि अनेक सूक्ष्म पदार्थ ज्ञातव्य हैं, इसीलिये जो इस शास्त्रकी बातोंको विशेष रूपसे सम- झनेमें असमर्थ हो, उसे वैयाकरण होने पर भी न बतावे। (ख) जो आत्मवित् न हो, उसे भी न पढ़ावे। किन्तु आत्म- वेत्ता या योगीको ही इस शास्त्रका उपदेश करे। क्यो- कि—उस पुरुषके आत्मज्ञानसे सब पाप दूर होजाते हैं, इसलिये वह थोड़े ही यत्नसे सूक्ष्म अर्थोंको जान- नेमें समर्थ होता है। (ग) अथवा—किसी शास्त्रके जाननेवालेसे 'इदं वित्' पदका प्रयोजन है, जिसने पहिले कोई भी शास्त्र न पढ़ा हो, उस अनिदंविद, मलिन या संस्कार-शून्यहृदयको यह शास्त्र उपदेश नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि—जिस पुरुषको किसी प्रकारका भी विज्ञान नहीं होता, वह स्वयम् न समझता हुआ अपने दोषको आचार्यमें ही लगाता है, कि—"आप ही गुरु नहीं समझता है, मुझे क्या समझावेगा" इसलिये जिसने पहिले अन्य शास्त्र नहीं पढ़ लिया हो, तथा किसी प्रकारका शास्त्रके जाननेके लिये मनमें जिसे खेद न हो, उसे निरुक्त शास्त्र नहीं पढ़ाना।