निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ३७ ग्राह्य अधिकारी । १-जो कोई भी पुरुष मेधावी हो, जिसे जन्मान्तरोंके अनुभवोंके संस्कार हो, अथवा तपस्वी हो, ये चाहे व्याकरण न भी पढ़े हों, किन्तु दोनोंको यह शास्त्र पढ़ाना चाहिये । क्योंकि-इन दोनों प्रकारके पुरुषोंको कुछ असाध्य नहीं है। जैसे-पूर्वकालमें तपके प्रभावसे ही स्वयम् ही ऋषियोको वेदार्थका प्रादुर्भाव होगया था, इसो प्रकार मेधावी पुरुष भी स्वयम् उत्प्रेक्षा करनेमें समर्थ हो सकता है, फिर उससे कहा जाय तो समझनेमें आश्चर्यही क्या है। अथवा और कोई पुरुष दृढ़ग्राही वा स्थिरमति शास्त्रके अर्थको समझनेमें समर्थ हो, ऐसे मनुष्यके लिये सर्वथा ही निर्वचन करे । किन्तु जो शरणागत न हो, उसके लिये कभी न उपदेश करे, चाहे वो तपस्वी, मेधावी तथा दृढ़ग्राही क्यों न हो ? जैसा कि-कहा है। “यश्चान्यायेन निब्रूयात् यश्चान्यायेन पृच्छति । तयोरन्यतरो मृत्युं विद्वेषं वाधिगच्छति ॥ ६॥” अर्थः—जो अन्यायसे निर्वचन करे और जो अन्यायसे पूछे, उन दोनोंमें जो दोषी हो वह, मृत्युको या विद्वेषको प्राप्त होता है। ( खं० ७ ) “विद्याह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि । असूयकायानुजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथास्याम् ॥ य आवृणोत्यवितथेन कर्णा व दुःखं कुर्वन्नमृतं सम्प्रयच्छन् । तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत्कतमच्च नाह ॥