निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ २ अ० १ पा० ७ खं० । अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणाऽवा । यथैव ते न गुरोर्भोजनीया- स्तथैव तान्न भुनक्ति श्रुतं तत् ॥ यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् । यस्ते न द्रुह्येत्कतमच्च नाह तस्मै माब्रूया निधिपाय ब्रह्मन् ॥” इति-। निधिः शेवधिः,-इति ॥ ७ ॥ विद्याकी अधिदेवता इच्छित रूप धारण कर किसी वेद-वेदाङ्गों- के जाननेवाले जितेन्द्रिय ब्राह्मणके पास आई, और उसके पास जा कर नम्र हो कर बोली— विद्या—हे ब्रह्मन् ! तू मेरी रक्षा कर । फिर रक्षित होकर मैं तेरे सुखका निधान या कोश बनूंगी । ब्राह्मण—मैं किससे तेरी रक्षा करू ? विद्या—जो मनुष्य दूसरेमें दोषारोप किया करते हैं, जिसकी वृत्तियां मन, वाणी, और देहमें समानतासे नहीं रहतीं, तथा जिसकी इन्द्रियां चञ्चल हों, या जिसके किसी न किसी अङ्गमें अपवित्रता बनी रहती हो, ऐसे मनुष्यके लिये मुझे मत दे । ब्राह्मण—ऐसा करनेसे क्या होगा ? विद्या—ऐसा करनेसे तुम्हारी मैं वीर्यवती हो जाऊंगी, किञ्च जो ब्राह्मण शिष्यके खुले हुए कानोंको सत्य-ब्रह्म (वेद) से भर देता है, जिसके भरनेसे उसे सुख हो जाता है, जो ब्राह्मण मोक्षके देनेवाले ज्ञानको देता हुआ उसके कानोंको भरता है, उसीको माता तथा पिता मानें, किन्तु दूसरे जन्मदाताओको नहीं, कहा भी है—