निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ३६ “उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता । “ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ [ म० सं०-२, १४६ ] अर्थः—जन्म देनेवाले और ब्रह्म ( वेद ) के देनेवाले दोनों पिताओंमें ब्रह्म देनेवाला ही पिता श्रेष्ठ होता है, क्योंकि-ब्रह्मजन्म ही ब्राह्मणका इस लोक और परलोकमें स्थायी रहनेवाला है। उस गुरुके लिये जो अकेला ही माता-पिता दोनोंकी मूर्त्ति है, कभी द्रोह न करे, चाहे घोर आपत्ति पड़े ॥ दुष्ट शिष्योंके लिये— जो ब्राह्मण मेधावी, गुरुसे विद्या पढ़ कर फिर उसका मन वाणी तथा कर्मसे आदर नहीं करते, वे जिस प्रकार गुरुके भोजन योग्य नहीं होते ( उनके यहां गुरु भोजन नहीं करते ) उसी प्रकार पढ़ा हुआ शास्त्र भी उनको रक्षा नहीं करता, अर्थात् शास्त्रके फलसे उन्हें संयुक्त नहीं करता । विद्या देने योग्य शिष्य । हे ब्रह्मन् ! जिसको तू जाने कि- “यह शुचि है, यम-नियमोंमें अप्रमत्त है, मेधावी है, ब्रह्मचर्यसे युक्त है, और जो तेरे लिये किसी आपत्तिकी अवस्थामें भी द्रोह न करे, उसो तेरे विद्या-रूप कोशकी रक्षा करनेवालेको तू मुझे दे ॥” “निधिः” । ‘निधि’ शब्दका अर्थ ‘शेवधि’ है, ‘शेव’ नाम सुखका और उसके निधान या आश्रयको ‘शेवधि’ कहते हैं ॥ ७ ॥ इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः ।