निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ २ अ० २ पा० १ खं० । “गोभिः श्रोणीत मत्सरम्”-[ अर्थ-] दूधसे सोमको पकाओ । इस ऋचामें 'गो' नाम दूधका है। 'मत्सर' नाम सोमका है। तृप्ति अर्थमें 'मदि' [ भ्वा० आ० ] धातुसे है। 'मत्सर' यह लोभका नाम भी है। क्योंकि-लोभसे धन, और उससे मनुष्य उन्मत्त होता है। 'पयस्' शब्द 'पा' पाने (भ्वा० प०) धातुसे होता है। अथवा 'ओप्यायी' वृद्धौ (भ्वा० आ०) धातुसे । 'क्षीर' शब्द 'क्षर'- श्च्योतने (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा 'घस्लृ' अदने (भ्वा० प०) धातुसे । 'ईर' प्रत्यय होता है। जैसे-'उशीर' शब्दमें । 'अंशुं दुहन्तो अध्यासत गवि” इस ऋचामें 'गो' नाम अधि- षवण चर्मका है। 'अंशु' नाम यजमानको सम्बन्ध मात्रसे ही सुखका देनेवाला । अथवा सब प्राणियोंके जीवनके लिये सुखरूप होनेवाला। 'चर्म' शब्द 'चर' गतौ (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा शरीरसे उखाड़ा जाता है, इसीसे वह चर्म है। ['वृती' हिंसायाम् (तु० प०) धातुसे है।] और-'गो' नाम चर्म और श्लेष्माका भी है। जैसे- “गोभिः सन्नद्धो असिवौल यख” अर्थः-'हे रथ तू 'गो' नाम चर्मसे मढ़ा हुआ, अथवा चर्बीसे चुपड़ा हुआ है, तू चल' इस रथकी स्तुतिमें । स्नाव (नाड़ी) और श्लेष्मा (चर्बी) का भी वाचक है। [जैसे-] “गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता” [अर्थः-] जो बाण गो या सूक्ष्म आँतोंके सूतोंसे बंधी हुई, और धनुष्मान्से प्रेरित हुई चलती है। ज्या-नाम धनुष्की तांत भी 'गो' कहलाती है। यदि वह गोके द्रव्यसे बनी हो, तो वहाँ 'गो' शब्द गौण है। और यदि गौकी नहीं है, तो 'बाणोंको चलाती है', इस व्याख्यासे मुख्य है ॥१॥