निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ४३ व्याख्या । यास्क मुनिने जैसी प्रतिज्ञा की थी, कि-'मैं समाम्नायकी व्याख्या करूंगा।' उसके अनुसार आप सम्पूर्ण समाम्नायकी सामान्य व्याख्याको पूरी कर चुके हैं,-जैसे कि, 'यह सब नामोंका सामान्य लक्षण है'-'यह आख्यातोंका'-'यह उपसर्गोंका' और 'निपातोंका' एवम्, उसीके प्रसङ्गमें शास्त्रके आरम्भके प्रयोजन कहे, १ आगमका परिशोधन किया, वेद और वेदाङ्गोंका विस्तार प्रयोजन सहित कहा, निघण्टु समाम्नायको तीन प्रकरणोंके विभागोंसे विरचनाका उपदेश किया, तथा अनेक विस्तारोंके सहित निर्वचन- का लक्षण कहा । अब विशेष व्याख्यासे समाम्नायकी प्रतिपद व्याख्या करना है, उसीके लिये विशेष प्रतिज्ञा करते हैं—“अथातोऽनुक्रमिष्यामः” विशेष व्याख्याका परिचय । विशेष व्याख्यासे प्रयोजन एक एक शब्दकी व्याख्यासे है, सामान्य व्याख्यामें शब्दोंके बड़े बड़े समूहोंके साथ परिचय दिये जाते हैं, जैसे—आख्यात और नाम आदि । किन्तु यहाँ निघण्टुमें जो ‘गौः’ ‘ग्मा’ ‘ज्मा’ आदि “देवपत्नी” पर्य्यन्त शब्द परिगणन किये हैं, उनमेंसे एक एक शब्दकी पृथक् पृथक् व्याख्या होगी । जिस प्रकार सामान्य व्याख्यामें आपने अनेक प्रसङ्गोंकी आप- त्तियोंके साथ अनेक उत्तम विषयोंका प्रदर्शन कराया है, उसी प्रकार आपकी विशेष व्याख्या भी बहुत चमत्कारोंको अङ्कमें लिये हुए है । निरुक्त-शास्त्रको आद्यन्त देखनेसे प्रतीत होता है कि—इस शास्त्रके द्वारा वेदके जिस विभागकी पूरी व्युत्पत्ति होती है, वह १—मन्त्रोंके आनर्थक्यका आक्षेप और उसका समाधान ।