निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ २ अ० २ पा० १ ख० ।
दूसरे किसी वेदाङ्ग या शास्त्रसे नहीं हो सकती, सर्वथा यह अङ्ग अपने प्रयोजनके लिये स्वतन्त्र और महत्व-पूर्ण है । शब्दोंके अर्थके स्थिर करने तथा उनके ऐतिहासिक तत्वकी शिक्षा देनेमें अन्य, शास्त्रोंसे इसका प्रथम आसन है, इसमें कोई आपत्ति नहीं उठा सकता । जिस प्रकार इस समाम्नायमें 'नैघण्टुक' 'नैगम' और 'दैवत' यह तीन काण्ड अलग अलग स्थित हैं, उसी प्रकार इनकी विशेष व्याख्यायें भी पृथक् पृथक् प्रकारकी हैं। ऐसा होना भी चाहिये था, क्योंकि—जब उनमे पृथक् पृथक् जातिके शब्द हैं, तो उनकी व्याख्याके उपाय या साधन भी पृथक् पृथक् होगे । इस स्वाभाविक नियमके अनुसार प्रथम क्रमागत नैघण्टुक काण्डमें प्रत्येक शब्दकी व्याख्यामें आवश्यकतानुसार प्रायः सात बातें दिखाई जावेंगी। जैसे—तत्व या व्याख्येय शब्दका वाच्य-अर्थ (१) पर्याय शब्द जो उसका समानार्थक, और उसी अर्थमें प्रसिद्ध हो (२) भेद या व्याख्येय शब्दकी व्युत्पत्ति (३) संख्या या निघण्टुमें व्याख्येय शब्दके समान अर्थमें दिखाये हुए शब्दोंकी गणना (४) संदिग्ध, व्याख्येय शब्दका वह अर्थ जो दिखाये हुए अर्थसे भिन्न हो (५) सन्दिग्धोदाहरण, अर्थात्-वह उदाहरण, जिसमें उन दोनों अर्थोंका सम्भव हो (६) और उसका निर्वचन, अर्थात् जो मन्त्र या निगम उदाहृत किया है, उसकी व्याख्या (७) । वास्तवमें व्याख्या उसीको कहते हैं, कि-जिस वस्तुकी व्याख्या करना हो, उस वस्तुके सम्बन्धको लेकर जितने प्रश्न उठ सकें, उनमें प्रत्येकका उत्तर दिया जाय । परन्तु मैं जहां तक समझता हूं, संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसके सम्बन्धको लेकर उठनेवाले प्रश्नोंका अन्त हो, सुतराम्, संसारकी प्रत्येक वस्तुके सकल प्रश्नोके अन्त पर अपने प्रश्नोंके अन्तको निर्भर करती