निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ४५ है। इस रीतिसे जो पुरुष किसी एक वस्तुकी व्याख्या करने बैठता है, मानो वह सकल संसारकी ही व्याख्या करेगा, किन्तु ऐसा करना सर्वथा असाध्य है, यदि साध्य होता तो अबतक कोई महापुरुष वैसा कर ही डालता, या, यो समझिये कि-संसारमें जितने पुस्तक हैं, वे सब उसी महाव्याख्याके भाग मात्र है। इस लिये मानना होगा कि-जिस वस्तुको व्याख्यामें वक्ताकी इच्छा- नुसार जितने प्रश्न आवश्यक या उपयुक्त हों, उनके उद्धारका ही नाम व्याख्या है। इसी प्रयोजनसे हमारे यास्क मुनि भी प्रत्येक व्याख्येय शब्दों- मे आवश्यक प्रश्नोंको दिखाते हैं, जिनके द्वारा अध्येता पुरुष शब्दोंके अर्थनिर्णयमें पूर्ण योग्यता प्राप्त कर लेता है। ऐसे व्याख्याके समझानेके लिये कोई कल्पित उदाहरण न रख कर यास्क मुनिके प्रथम व्याख्येय गो शब्द (गौः) तथा उसकी व्याख्याको ही हम लेते हैं, उसीके अनुसार सकल निघण्टुक शब्दोंमें कल्पना करना होगी। “गौः” व्याकरणके समान इस शास्त्रका भी प्राधान्यसे शब्दतत्व ही सामान्य व विशेष रूपसे व्याख्येय होता है, इस लिये यहाँ 'गौः' आदिके कहनेसे उसके अर्थकी व्याख्याका लक्ष्य न समझ कर शब्द- के स्वरूप पर ही ध्यान रखना होगा। यहाँ “गौः” या 'गो' शब्द, जिसका शरीर 'ग्-ओ'-इन दो अक्षरोंसे बना हुआ है, व्याख्येय है। (१) गो शब्दका तत्व क्या है, जिसका यह अभिधान करता है ? पृथिवीरूप द्रव्य। (२) गो शब्दका पर्याय क्या है, जो इसके अभिधेय अर्थको अभि- धान करता है ? 'पृथ्वी' शब्द।