निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 213, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ २ अ० २ पा० १ खं० । (३) गो शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है, या वह क्या कारण है, जिससे यह गो शब्द अपने पृथिवीरूप द्रव्य अर्थ पर रहता है ? [ क ] यह दूर तक गई हुई है, “दूरं गता भवति” अर्थात् जहाँ तक मनुष्य जाय, वहां सब जगह मिलती है, इसका अन्त नहीं है । प्रयोजन यह है कि—‘ग्’ गमॢ गतौ (भ्वा० प०) का होनेसे गमन अर्थको बोधन करता है, और ‘ओ’ (उ० प्र०) सम्बन्धको, क्योंकि-पृथिवीमें गमनका सम्बन्ध है, इसीसे इन दोनों अक्षरोंका योगरूप ‘गो’ शब्द पृथिवी पर गया । [ ख ] जिससे कि-इस पर सब भूत ( प्राणी ) गमन करते हैं, इसीसे यह ‘गो’ है, इस व्युत्पत्तिमें भी दूसरे प्रकारसे गमनके सम्बन्धके कारण ही ‘गो’ शब्द पृथिवी द्रव्यमें रहता है । “यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति” । (४) क्या ‘गो’ शब्द ‘गमॢ गतौ’ ( भ्वा० प० ) धातुसे अतिरिक्त धातुसे भी बन सकता है ? हाँ, ‘गाङ् गतौ’ ( भ्वा० आ० ) धातुसे । इसमें भी ‘गम्’ के समान ‘ग्’ और गति अर्थ दोनों हैं । (५) क्या ‘गो’ शब्द ‘गम्’ या ‘गा’ धातुसे ही बनता है, इसमें किसी नामकरण प्रत्ययके योगकी आवश्यकता नहीं है ? नहीं, है,-इसमें ‘ओ’कार नामकरण प्रत्यय है । “ओकारो नामकरणः” । धातु केवल क्रियाहीको कहता है, किन्तु उसके सम्बन्धको नहीं, इसीसे वह अकेला किसी द्रव्यका नाम नहीं बन सकता, जैसे जो धातु खानेका नाम है, वह खानेवालेका नहीं हो सकता, उसके बोधनके लिये भाषामें खानेके सामने ‘वाला’ शब्दके समान किसी शब्दके योगकी अपेक्षा रहती है, ऐसे ही सम्बन्धके बोधक