निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ४७ शब्दंशोंको कृत् प्रत्यय या नामकरण कहते हैं। इसी प्रकार धातुओं- से नामकरणोंके योग होनेसे सब नाम बनते हैं। यही नामकरण प्रत्ययोंकी नामकरणता है। (६) क्या निघण्टुके अनुसार 'गो' शब्दका पृथिवी द्रव्य ही अर्थ है, अन्य कोई नहीं ? नहीं, है, इन्हीं दोनों कारकोंमें तथा इन्हीं दोनों धातुओंसे 'गो' यह पशुका नाम होता है। अर्थात् यह भी स्वयम्, गमन करता है, तथा इसमें भी मनुष्य दुग्धादिके लिये गमन करते हैं। “अथापि पशुनामेह भवति” । (७) क्या यह 'गो' शब्द जिस प्रकार सम्पूर्ण 'गो', पशुको बोधन करता है, उसी प्रकार उसके किसी भाग विशेषको भी बोधन करता है ? हाँ, कहीं, गोके दूधका नाम भी हो जाता है। जैसे-'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' । [ ऋ० सं०-७, १, ३, ४ ] यह अनेक प्रकारसे शब्दकी वृत्तिका विषय इस लिये दिखाया जाता है कि-क्यों नहीं शिष्य, इस प्रकारसे शब्दकी वृत्तियोंको जान कर मन्त्रोंके अर्थोंका निर्वचन करेगा । “आधावता सुहस्त्यः शुक्राष्टभ्णीत मन्थिना । गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ॥” [ ऋ० सं०, ७, १, ३, ४ ] अथास्य आङ्गिरस ऋषि, गायत्री छन्दः, ग्राव (पाषाण) स्तुतिमें विनियोग । हे सुवर्णसे अलकृत हस्तवाले अध्वर्युओ ! दौड़ आओ, इन शुक्रा मन्थी नामक ग्रहोको, समयके बीतनेसे पहिले ही, ग्रहण करो, और गौओंसे निकले हुए दुग्धसे इस सोमको पकाओ, तथा एक कर ठण्डा होने पर उससे होम करो।