निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ २ अ० २ पा० १ ख० । यहाँ पर जिस सोम-पाकका विधान मन्त्रसे ही प्रतीत होता है, वह [सोम-पाक] साक्षात् गौओंसे शक्य नहीं, इस कारण गो शब्दसे, गौके दुग्ध का ही ग्रहण है ऐसी, प्रतीति होती है। १—उक्त मन्त्रमें “मत्सर” नाम सोमका है, क्योंकि-वह 'मन्द' [मदि स्तुति मोद मद स्वप्न कान्ति गतिषु] धातु [भ्वा० आ०] से बनता है। “मदन्ते तृप्यन्ति देवता अनेन इति मत्सरः” जिस- से देवता तृप्त होते हैं, वह 'मत्सर' कहा जाता है। २—'मत्सर' लोभका भी नाम है, क्योंकि, मनुष्यमें जब लोभ आ घुसता है, तब वह धनको ही सब कुछ देखता हुआ, अन्य जगत्- से विमुख होकर उन्मत्त हो जाता है। पहिला 'मत्सर' शब्द, उदाहरणमें आनेसे 'उदाह्रण-प्रसक्त' होकर व्याख्यामें आया, और दूसरा 'मत्सर' शब्द प्रथम 'मत्सर' शब्दके समान होनेसे ही आया है, ऐसे शब्दको 'शब्द-सामान्य प्रसङ्ग-प्रसक्त' कहते हैं। “पयः”—[क-] पिबतेर्वा पानार्थस्य” 'पयस्' शब्द 'पा' (भ्वा० प०) पाने, धातुसे बनता है, क्यों कि-वह पान किया जाता है। [ख-] “प्यायतेर्वा वृद्ध्यर्थस्य” अथवा वृद्ध अर्थ- वाले 'प्याय्' [भ्वा० आ०] धातुसे बनता है, क्योंकि, उससे प्राणी वृद्धिको प्राप्त होते हैं। उक्त मन्त्रमें जो 'मत्सर' शब्द आया है, उसीका पर्याय पयस् शब्द है, इससे, इसको व्याख्या की गई है। ऐसे शब्दको पर्याय-प्रसक्त कहते हैं। “क्षीर क्षरतेः” श्च्योतनार्थस्य । 'क्षीर' शब्द 'क्षर' (भ्वा० आ०) धातुसे बनता है, 'क्षर' का क्षरण या झरना अर्थ होता है, दुग्धको क्षीर इसीसे कहते हैं, कि—वह ऊधस् या ऊँढ़ीसे झरता है।