भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 229

६२ ३ अ० २ पा० ३ खं० । 'शृङ्ग' शब्द बनता है, क्योंकि-सींग वाला पशु उसीसे मारता है । अथवा शिरसे निकलता है, इससे वह शृङ्ग है । अथवा परमपूज- नीय स्थानमें स्थित होता है, इससे वह 'शृङ्ग' है । ( ३ ) 'पद' 'पद' गतौ' धातुसे 'पाद' शब्द [ जो पैरका नाम है ] बनता है, क्योंकि, उससे ही, शरीर धारी चलते हैं, और पादके धूलिया कीच आदिमें धरनेसे जो वैसीही आकृति उत्पन्नहो जाती है, वह पद कहाता है । चाहे वह पशुकाहो या मनुष्यका । पद शब्द पन्द शब्दसे बनता है, और वह खोज का नाम है । प्रसक्तानु-प्रसक्त । पाद नाम किसी भी वस्तुके चतुर्थांशका है, उसीके सादृश्यसे पशुके पैर को पशु-पाद कहते हैं, क्योंकि,-वहभी पशुका चौथा भाग जैसा प्रतीत होता है । एवम् उसीके सादृश्यसे दीनार (अशरफी) आदि मुद्राओंके चतुर्थांशको भी 'दीनार पाद' आदि नामसे बोलते हैं, ये प्रभाग पाद कहाते हैं । इन प्रभाग पादों- की समानतासेही और और वस्तुभी पाद कहाते है, जैसे ग्रन्थ पद, क्षेत्रपद, आदि । क्योंकि उनमेंभी उसी प्रकारसे विभाग है । सुतराम्, 'पद' शब्दका मूल 'पाद' शब्द है । उपसंहार । इसी प्रकार और और शब्दोंमेभी सन्देह होते हैं, केवल गो शब्दका पद शब्दमें ही नहीं । उन सभी स्थानोमें निर्वचनका स्वा- भाविक लक्षण यह है कि "वे यदि समान क्रियावाले हों"तो उनका समानही निर्वचन करना चाहिये, और यदि भिन्न भिन्न क्रिया,युक्तहों तो भिन्न भिन्न प्रकारसे निर्वचन करना, इसी रीतिसे निर्वचन होता है।"