निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। ६१ ये इक्कीस (२१) पृथ्वोके नाम गिने गये हैं;। उनमें निर्ऋ- ति' शब्द निरमणं या सुख पहुंचानेसे-[ पृथिव्याः नाम ] [ 'रमु' 'क्रीड़ायाम्' ( भ्वा० आ० ) धातुसे ] दूसरी निऋति कष्ट- की आपत्ति है, जो 'ऋच्छ' इन्द्रिय प्रलये (तु० प० ) धातुसे है। वह पृथिवीके साथ सन्दिग्ध होती है । उन दोनों का भेद है। उसकी [ कृच्छ्रापत्ति और पृथिवीकी भी ] यह निर्वचन करने वाली ऋचा है ॥ ३ ॥— व्याख्या— “तांवां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्रगावो भूरि शृङ्गा अयासः॥ अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पद मवभाति भूरि ॥” [ ऋ० सं०-२, २, २४, ६ ] दीर्घतमस् ऋषि । विष्णु देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । रथके अव- धानमें तथा सोमातिरेक शस्त्रमें विनियोग । इस मन्त्रमें यजमान और यजमान-पत्नी दोनोंके लिये आशीर्वाद है। ऋत्विज् कहते हैं कि—'हम तुम दोनोंके जानेके लिये उन निवास स्थानोंकी कामना करते हैं, जिनमें बहुत दीप्तिवाले निरन्तर फिरनेवाले तथा महागति (तीब्र निरन्तर एवम् बहुत दूर तक चलने वाले ) रश्मियें या किरणें हैं, भगवान् विष्णुका परम पद या आदित्य-मंडल रूप स्थान, सम्पूर्ण जगत्को अपनेसे नीचे करके अत्यन्त प्रकाशित होता है। अथ एक-निरुक्तम् । (१) “भूरि” यह बहुतका नाम है। क्योंकि-देनेसे वह बहुत होता है । (२ “शृङ्ग” 'श्रिञ्सेवायां' धातुसे बनता है । क्योंकि वह शिरमें आश्रित होता है । अथवा 'शृहंसायाम्' धातुसे